अराजकता संघर्ष की ओर अग्रसर, राज-नीति

व्ही.एस.भुल्ले। आज की राजनीति में सत्ता में काबिज हो, जन व राष्ट्र सेवा के लिये जिस तरह से राज-नीति अराजक संघर्ष की ओर अग्रसर है उसमें हो सकता है किसी को कोई नई बात न दिखें। मगर राष्ट्र व जनकल्याण के लिये लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता तक पहुंचने के लिये किसी भी राष्ट्र के जीवन मूल्यों और अहम मुद्दों  की नीति अपनाई जाती रही है। शायद उससे चार कदम आगे आज हमारी राजनीति जा पहुंची है। 

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि जो राजनीति 80 के दशक तक राष्ट्र के अहम मुद्दों और लोगों के जीवन मूल्यों की रक्षा के लिये हुई उसने आज तक विगत 30 वर्षो का ल बा रास्ता तय कर, कभी सांमत राजा, रजवाड़े, पूंजीपतियों तो कभी धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, भ्रष्टाचारी, अपराधियों को समेटे एक ऐसे गठ जोड़ में तब्दील लोगों का राजनीति में प्रार्दुभाव हुआ है। जिसका परिणाम कि लोकतंत्र के पवित्र मंदिरों तक में ऐसे लोगों की पेठ और एक नई राजनैतिक संस्कृति पैर जमा समय-समय पर लोकतंत्र के मंदिरों की गरिमा एवं राष्ट्र व लोगों के जीवन मूल्यों को रोंध अपमानित करने से नहीं चूकती है। 

सरकारों व सदनों में जघन्य, ग भीर अपराधों में आरोपित लोग पहुंच जब लोकतंत्र को संचालित करने में जुटे हो, तो समुचे लोकतंत्र कलफ उठना स्व ााविक है। और आज जिस तरह से भीड़ के फैसले सडक़ पर हो रहे है फिर विषय और मुद्दें जो भी हो। मगर आक्रोशित भीड़ के हमले अपनो के ही बीच थम नहीं रहे। इतना ही नहीं अगर बात व्यक्ति, समाज, व्यवस्था तक ही सीमित रहती तो भी ठीक था। क्योंकि सत्ता के लिये आरोप-प्रत्यारोप, संघर्ष और सेवा के कई रास्ते प्रचलित थे। मगर जिस तरह से सत्ता के लिये सियासी दलों के बीच मार-काट की खबरें आ रही है उससे साफ है कि मामला अब ज्ञापन, धरना, आन्दोलन और सेवा तक सीमित नहीं रहा मामला अब सियासी दलों में धीरे-धीरे सीधे सडक़ों पर संघर्ष में तब्दील होता दिख रहा है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये कोई सुखद बात नहीं। 

जिस तरह की घटनायें केरल, पश्चिम बंगाल में राजनैतिक दलों के बीच हिंसात्मक संघर्ष की देश के सामने है और कुछ दिन पूर्व देश के बड़े राजनैतिक दल कॉग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के वाहन पर पत्थर से हमले की बात सामने आयी है वह लोकतंत्र में विश्वास रखने वालो को काफी डराने वाली है। 

बेहतर हो देश के नागरिक, बुद्धिजीवी, समाज व धर्मो के पथप्रदर्शक और सियासी दल अपनी-अपनी आशा, आकांक्षाओं और स्वार्थो से निकल उस मानवता, इन्सानियत उन निरीह जीवों तथा समाज और उस महान राष्ट्र के बारे में विचार करें जिसकी संस्कृति, स यता, आध्यात्म और तकनीक की तूती आज भी सारे विश्व में गूंजती है। 

अगर आज भी हम नहीं चेते तो यह महान राष्ट्र का भूभाग भी रहेगा इसकी पवित्रता आलोकिक आध्यात्म और तकनीक, विज्ञान भी रहेगा। मगर आम नागरिक का जीवन खुशहाल, स पन्न नहीं बचेगा, जो हमारी समुची महान मानव स यता के लिये बड़ा ही शर्मनाक होगा। 
जय स्वराज 
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