म.प्र. सरकार को शाप या वरदान

विलेज टाइम्स, समाचार सेवा : शाह साहब का म.प्र. में प्रत्याशित दौरा क्या शुरु हुआ धडक़नों की पल्स मापते कुछ नेताओं की पल्स जहां सामान्य हो गयी तो कुछ की पल्स फिर से तेज हो गयी। भाई लोगों को सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर कुछ अप्रत्याशित उम्मीद काफी दिनों से बंधी थी। जैसी की राजनैतिक गलियारों में चर्चा थी मगर संपादकों के बीच 2018 को चुनाव वर्तमान सरकार के मुखिया के नेतृत्व में लड़े जाने की घोषणा ने मानो मन्द पड़ती पल्सों में तूफान ला दिया। यह अलग बात है कि यह सियासी तूफान भले ही न उठे मगर यह तूफान सियासत में नहीं उठेगा इसकी संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। 

फिलहाल तो म.प्र. की राजनीति में तूफान आने के पहले की शान्ति है। फिर वह पक्ष हो या विपक्ष, मगर ऐसे में अगर कोई अप्रत्याशित अलनीनो जैसा तूफान उठ खड़ा हुआ तो सत्ता या पुन: सत्ता की बांठ जौ रहे, लोगों को सत्ता से बाहर रहना पढ़े तो कोई अतिशंयोक्ति न होगी। 

क्योंकि जहां सत्ताधारी दल में अन्दर ही अन्दर जो लावा धधक रहा है तो वहीं ज्वालामुखी का पूर्व शिकार विपक्ष आज भी नई उम्मीद की आशा में फिर से सक्रिय हो उठा है वहीं पक्ष-विपक्ष की कार्यप्रणाली से व्यथित हो, अब न पक्ष, न ही विपक्ष को अस्तित्व में देखना चाहता है। क्योंकि भाई लोगों की पीड़ा यह है कि उनकी आशा आकांक्षाओं से विगत दो दशक से कोई वास्ता न तो पक्ष का रहा, न ही विपक्ष का, और न ही वह यह साबित कर सके कि जनभावनायें क्या होती है।

दबा, कुचला जनमानस आज स्वयं को ठगा सा मेहसूस करता है उससे शाह साहब की घोषणा और असतित्व खो चुकी कॉग्रेस के ल बरदारों के बीच मचे घमासान ने म.प्र. के लोगों को निराश ही किया है। अगर ऐसे में पक्ष-विपक्ष में तथा म.प्र. में दबा, कुचला वर्ग अगर किसी स भावना के साथ सक्रिय होता है तो निश्चित एक नया तूफान आना संभव है जैसी कि स भावना सियासी गलियारों में स्पष्ट परिलक्षित होती दिखाई पड़ती है।

फिलहाल शाह की 2018 की घोषणा का परिणाम व भविष्य क्या होगा कहना जल्दबाजी होगी मगर इतना तय है कि अगर इस बीच नया समीकरण म.प्र. की राजनीति में कोई बनता है तो म.प्र. में पक्ष व विपक्ष की महत्वकांक्षाओं के बुर्ज हिलना तय है।  
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