जंगी दल से जुबानी जंग, सच को मुंह चिढ़ाता आयना, कमजोर, मजबूर विपक्ष के बीच, सत्ता की हुंकार

व्ही.एस.भुल्ले:  देश में अहम मसलों को लेकर चल रही जुबानी जंग के बीच कमजोर, मजबूर विपक्ष जंगी सत्ताधारियों के बीच कैसे अपनी असमत और बजूद बच...

व्ही.एस.भुल्ले: देश में अहम मसलों को लेकर चल रही जुबानी जंग के बीच कमजोर, मजबूर विपक्ष जंगी सत्ताधारियों के बीच कैसे अपनी असमत और बजूद बचा पायेगा फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर सच को मुंह चिढ़ाता आयना तो यहीं साबित करता है कि वह सच से कोसो दूर है। जबकि सच तो यही है कि एक मजबूत सत्ताधारी दल को चुनौती सिर्फ एक वैचारिक विपक्ष ही दे सकता है।सत्ता की कड़ी चुनौती फिलहाल यह है कि वह किसी भी कीमत पर कॉग्रेस मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त और जनसेवा विकास, राष्टीयता युक्त भारत का निर्माण करना चाहता है। भारत में यह नारा बुलंद करने वाले सत्ताधारी दल का सामना विपक्ष के नाम वैतार्किक वे दिशा, नकारात्मक विरोध, सदन के अन्दर या बाहर एक ऐसे कमजोर विपक्ष के साथ है जो उसकी वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुये सीधा सामना कोसो दूर करते नहीं दिखता। जिनके पास अब न तो कोई चमत्कारिक नेतृत्व है, न ही उत्तम चरित्र और कोई चेहरा शेष बचा है। जो शेष है वह भी अब सत्ताधारी दल या गठबन्धन के सीधे निशाने पर है। 18 राज्यों सहित देश की सरकार में अपना परचम फहराने वाला दल देखा जाये तो  कोई अकेला राजनैतिक दल या संगठन नहीं। बल्कि उसके मातृ संगठन में लाखों निस्वार्थ, त्याग पुरुष, विद्ववानों की ल बी फौज के साथ उनकी वैचारिक नर्सरियों में करोड़ोंं नौनिहालों की फौज है। जो शिक्षा के साथ इन्सानियत और राष्ट्रवाद को समझती है इतना ही नहीं इस मातृ संगठन की एक सेकड़ा से अधिक लगभग डेढ़ सौ के करीब ऐसी अनुवांसिक ईकाईयां और संगठन है जो स्वयं स्वचालित और अनुशासित है। जिनमें एक से एक चमत्कारी नेतृत्व, उत्तम चेहरे और चरित्रवान लोग है, जो सत्ता से इतर स्वयं को स्वचालित बना अपने मातृ संगठन के लक्ष्यों के प्रति पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ कार्य करते है।  

इसके अलावा सत्ता में भी कई ऐसे चेहरे व नेता सत्ताधारी दल के पास है जिन्हें वह चुनावों में भुना उनका लाभ उठाता रहता है। अगर प्रमुख सत्ताधारी दल के कुनवे की, हम गिनती छोड़ भी दें तो गठबन्धन में शामिल कई ऐसे सहयोगी, संगठन, राजनैतिक दल सत्ता के अन्दर और बाहर है, जो सत्ताधारी दल के साथ खड़े है। वहीं सदन में बैठने वाले कई विपक्षी दलों में भी अघाषित रुप से सत्ताधारी दल से सहानुभूति रखने वाले लोग भी बने रहते है। 

अगर हम सदन के अन्दर या बाहर विपक्षी दलों की स्थिति देखे तो अपने-अपने स्वार्थ और नीतियों के चलते उनका अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग है। अगर हम प्राप्त वोट प्रतिशत के आधार पर देखे तो कॉग्रेस ही एक ऐसा भारत का प्रमु ा विपक्षी दल है जिसे 54 सांसद के बजाये 45 के लगभग सांसद होने पर प्रमुख विपक्षी दल होने का ओहदा सदन में प्राप्त नहीं है। देश भर के राज्यों में कॉग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दलों के हालात यह है कि आपसी सिर भुट्टबल के चलते या तो अपनी सत्तायें गवां रहे या फिर हारने के बाद अपना अस्तित्व ही खोते जा रहे है। 

ऐसे में इसे देश का र्दुभाग्य कहे या सौभाग्य कि विरासत में मिली तोड़ फोड़, साम, नाम, दण्ड, भेद की नीत का आलम यह है कि अच्छे-अच्छे कद्दावर, धुरधंर दलों को, विजयी पथ पर बढ़ते सत्ताधारी दल को देख पसीने आ रहे। अगर ज्ञान, विज्ञान की माने या साम, नाम, दण्ड, भेद की नीत को पहचाने तो उत्तर में एक मात्र सूवा हिमाचल, पूर्व का उड़ीसा और दक्षिण ही तमिलनायडू, केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल भी अब सत्ताधारी दल की पकड़ से कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं। कारण साफ है सत्ताधारी दल के पास मोदी जैसा चेहरा व केन्द्र तथा देश के 18 राज्यों में स्वयं या स िमलित सरकारों सहित उसका अपना राष्ट्रवाद, सेवा, विकास को लेकर स्पष्ट एजेन्डा है। बस उसे अब शेष राज्यों में समर्थक सहयोगी और उनका झण्डा उठाने वाले चाहिए, जिसके लिये वह अमितशाह के नेतृत्व में ऐड़ी चोटी का जोर लगा, नये-नये चेहरों की देश भर में तलाश कर उन्हें स्थापित करने मेंं जुटा है। 

अब ऐसे में मुद्दा विहीन, दिग्भ्रमित, मजबूत संगठनात्मक संरचना से कोसेा दूर कॉग्रेस, न तो मौजूद दल, संगठन ही स हाल पा रही, न ही संगठनात्मक संरचना देश के उन दूर-दराज प्रदेशों में खड़ा कर पा रही जहां कॉग्रेस के पास अभी  कुछ शेष है। जहां तक कॉग्रेस के अनुवांशिक संगठनों का सवाल है तो उनका जैसे मानो बंटाढार हुआ पढ़ा है उस पर से उसके पास न तो कोई अहम मुद्दें है, न ही ऐसी कोई रणनीति, सिवाय इसके कि या तो उसके नेता, प्रवक्ता टी.व्ही. डिवेटों, सदन या सडक़ों पर, जब तब दिशाहीन हो, सत्ताधारी दल या मीडिया द्वारा उछाले गये प्रायोजित सवालों पर जबाव या हो, हल्ले में सारी ताकत गवा रहे है जैसा कि सत्ताधारी दल की रणनीत अनुसार कॉग्रस विगत 32 वर्षो से करती चली आ रही है। जिसके चलते 84 में जो सत्ताधारी दल 2 सीटो पर सिमटा था वहीं दल आज 32 वर्ष बाद अपनी रणनीत अनुसार आज केन्द्र ही नहीं 18 राज्यों में सत्ता सुख भोग, कॉग्रेस को ललकारने से नहीं चूक रहा। 

अगर यो कहे कि अघोषित रुप से सत्ताधारी दल ही पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभा रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। बैसे भी कहावत है कि कोई भी संगठन स्वार्थी, लालची, सहयोगी और मूर्ख सलाहकारों से नहीं चलते उसके लिये देश की खाक छान देश व देश की आवाम का मर्ज समझना पड़ता है। उसकी आशा आकांक्षाओं को सर आंखों पर बिठा, संगठन में ऐसे सेवक, सहयोगियों, बुद्धिजीवियों को जोडऩा पड़ता है, जो वैचारिक रुप से राष्ट्र, दल व जनसेवा का जज्वा ले संगठन मजबूत कर राष्ट्र सेवा, जनसेवा करना चाहते हो, न कि अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने दल को ही दांव पर लगा देना चाहते हो। 

बहरहाल ऐसा ही हाल कुछ क्षेत्रीय दलों का भी है चाहे फिर वह रा.जे.डी हो, जिसने अहम अहंकार में एक सहयोगी खो महा गठबन्धन की कब्र खोद दी, वहीं उ.प्र. में भी चाल, चरित्र की बली चढ़ी बसपा, सपा हो, फिलहाल  तो सत्ता में मौजूद तृणमूल और केरल की कमियूनिष्ट, तमिल में एआईडीएमके या उड़ीसा का वीजू जनता दल हो फिलहाल इनका भी भविष्य फिलहाल भविष्य के गर्भ मे है। 

अगर देश को सर्वाधिक उ मीद किसी एक अच्छे, मजबूत विपक्षी दल के रुप मे थी तो वह कॉग्रेस से थी जिसे वह विगत कुछ वर्षो से निभाने में असफल और अक्षम साबित हो रही है। सन 2014 के बाद कॉग्रेस को जो मौका अपने  संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने व अहम मुद्दों पर सकारात्मक रवैया अपना, नये मुद्दों के साथ देश भर में नये-नये नेतृत्वों को बुजुर्गो की छत्रछाया में अनुशासनात्मक ढंग से कार्यकत्र्ताओं को खड़ा करने मिला था वह भी जाता दिखाई देता है। मगर फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि कॉग्रेस के नेतृत्व में 2019 में बहुत कुछ ऐसा होने वाला है जिसकी उम्मीद देश को कॉग्रेस से है। अगर कॉग्रेस यह जबावदेही नहीं निभा सकी, तो निश्चित ही कॉग्रेस के लिये भारतीय राजनीति में एक काला अध्याय साबित होगा और अन्य विपक्षी, क्षेत्रीय दलों का जो भी हो, उससे देश को बहुत फर्क पडऩे वाला नहीं। क्योंकि उनकी जबावदेही किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित है जबकि कॉग्रेस की जबावदेही समुचा देश है। जब तक कॉग्रेस दल में ही छिपे उन सत्ता स्वार्थियों या अन्य दलों के लिये सिमपेथी रखने वालो की तलाश कर, ऐसे लोगों को कॉग्रेस से नहीं जोड़ती जिनकी गहरी आस्था कॉग्रेस में है और जो कॉग्रेस के लिये खाटी नेता, कार्यकत्र्ता साबित हो सकते है। तब तक सत्ताधारी दल, कॉग्रेस सहित क्षेत्रीय दलों पर सत्ता, संगठन की हनक और साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति के चलते तोडफ़ोड़ या नीचा दिखाने की नीति अपना कारवां इसी तरह आगे बढ़ाती रहेगी। क्योंकि कॉग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलो के मुख्य, प्रमुख या अभी तक चमकदार नेताओं की छवि रखने वालो में वह अनौपचारिक ताकत, चमक रणनीति या राजनैतिक कौशल नहीं बचा जो वह अकेले ही या चंद सहयोगियों के सहारे मुद्दा विहीन नकारात्मक विरोध कर,  सत्ताधारी दल के राष्ट्रवाद युक्त और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अभियान से स्वयं का अस्तित्व बचा सके। 
जय स्वराज

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Village Times: जंगी दल से जुबानी जंग, सच को मुंह चिढ़ाता आयना, कमजोर, मजबूर विपक्ष के बीच, सत्ता की हुंकार
जंगी दल से जुबानी जंग, सच को मुंह चिढ़ाता आयना, कमजोर, मजबूर विपक्ष के बीच, सत्ता की हुंकार
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