पुरखों का श्राफ है, या शहर वासियों का र्दुभाग्य शिवपुरी में अवर्षा

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, वीरेन्द्र शर्मा, म.प्र. शिवपुरी : अब इसे पुरखों का श्राफ कहे या इस शहर का र्दुभाग्य जो शिवपुरी जैसे 100 वर्ष पूर्व समुचे क्षेत्र में सबसे सुन्दर सर्वसुविधा युक्त शहर को कभी लूट, हत्या, अपराध, अपहरण, डकैती तो कभी नैसर्गिक सुविधाओं के नाम दो-चार हो कलफना पड़ता है। जैसे तैसे गड्डा धूल से राहत मिल वर्षो से पेयजल को भटकते लोगों को सिन्ध के शुद्ध पेयजल की आस बधी है कि इस वर्ष ऊपर वाले ने बारिस को तरसा इस शहर को इस कदर निराश किया है कि लोग अब इस शहर से उफ करने लगे। 

अगर आध्यात्म, परंपरा, संस्कृति, धर्म में आस्था रखने वालों की माने तो यह ऊपर वाले की सजा है या पूर्वजों का श्राफ। हालाकि कुछ लोग यह कहते भी नहीं थकते कि पूर्वज कभी अपनो से नाराज नहीं होते, मगर ऊपर वाला अवश्य न्याय करता है। 

जिस तरह से सीपरी गांव को शिवपुरी शहर ही नहीं सिंधिया राजवंश का सचिवालय बना इस शहर को 100 वर्ष पूर्व सुन्दर सर्व सुविधा युक्त शहर बना, शहर वासियों को सडक़, बिजली, टेलीफोन, रेल, झील, तालाब, सीवर लाइन, खेल मैदान, सांस्कृतिक भवन सहित हाईस्कूल, होटल, शहर में नहरो का जाल बिछा, प्राकृतिक वातानूकूलित बना, बर्फ, साबुन, कत्था के उघोग लगाने के साथ इस सुन्दर शहर को बसाने वाले माधौ महाराज की कई वर्षो बाद भी उनकी मूर्ति का प्रस्थापित न हो पाना उस पुण्य आत्मा के साथ अन्याय है। लोगों को लगता है कि यह उसी अन्याय का परिणाम है, कि  विगत 15 दिनों से पानी से लदे बादल शिवपुरी शहर आने या शहर से गुजरने के बाद भी शहर में वर्षा नहीं हो रही है। 

हालांकि यह लोगों की आस्था, किपदंती हो सकती है मगर यह सत्य है कि माधौ महाराज एक बड़े शिव भक्त थे  इतना ही नहीं वह अपनी मां के भी बड़े भक्त थे। अपनी मां के प्रति उनकी भक्ति के समर्पण की पराकाष्ठा को इसी चर्चा से भांपा जा सकता है। कि शिवपुरी स्थित छत्री में उनकी क्षत्री उनकी मातृश्री की छत्री के सामने बनी है क्योंकि कहा जाता है कि उनकी मां की धर्म में गहरी आस्था थी और बाणगंगा के पास छत्री स्थित मन्दिर पर वह जब भी शिवपुरी आती थी तो पूजा वह वहीं पर अवश्य करती थी। 

बाणगंगा स्थित स्थान उनके भजन पूजन के लिये उन्हें इतना प्रिय था कि आज उनकी इच्छानुसार उनकी छत्री उसी स्थान पर है। एक कहावत यह भी है कि वह कभी भी अपने प्रिय पुत्र, विकास पुरुष माधौ महाराज को अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देती थी। यहीं कारण है कि मां की भावना को स मान रखते हुये उन्होंने अपनी छत्री मां के सामने बनाने की इच्छा रखी और उनकी छत्री उनकी मां के सामने आज मौजूद है। एक कहावत शहर में यह भी है कि माधौ महाराज अपनी मां से इतना स्नेह रखते थे कि हर वर्ष निकलने वाले, अपनी मां के छबीने के रथ को क्षत्री से नंगे पैर, लोगों के साथ मिल खींचते थे और उन्हें शहर का भ्रमण कराते थे। इसके अलावा वह कभी-कभी आज के माधव चौक के नजदीक, जहां उनकी मूर्ति प्रतिस्थापित थी, वहीं पास में स्थित मन्दिर पर अवश्य आते थे जहां वह शहर वासियों से सामान्य तौर पर औपचारिक अनौपचारिक संवाद भी करते थे।

बहरहाल यह कहावत, किवदंतियां, चर्चायें कितनी सच है यह तो तत्कालिक लोग और जानकार ही जाने, मगर अवर्षा के चलते जिस तरह की चर्चायें, आये दिन नये सिरे से खड़ी होने वाली समस्याओं को लेकर चल पड़ी है उनका अन्त क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, मगर भारतीय संस्कृति, पर पराओं में आस्था रखने वालो के लिये फिलहाल यह बहस का विषय बना हुआ है।
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