प्रयास, पीढ़ा, परिणामों से व्यथित देश, दिशा तो ठीक, मगर दशा पर संदेह

व्ही.एस.भुल्ले :  जिस आशा, उम्मीद के देश के प्रधानमंत्री जी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को चौथी बार संबोधित किया वह दे...

व्ही.एस.भुल्ले : जिस आशा, उम्मीद के देश के प्रधानमंत्री जी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को चौथी बार संबोधित किया वह देश के सामने है। देश को सामर्थ, संपन्न, शक्तिशाली, खुशहाल बनाने के लिये जो खाका प्रधानमंत्री जी के उदबोधन में दिखा उसे सुनकर तो यहीं लगता है कि देश की वर्तमान दिशा भी ठीक है और देश के कई संदेहों के साथ दशा भी ठीक कही जा सकती है। 

देखा जाये तो, जो देश का खाका, देश के प्रधानमंत्री जी ने देश की बाह सुरक्षा से लेकर आन्तरिक सुरक्षा तथा देश की संपन्नता, सुचिता, सदभावना, कानून का राज और सबके साथ सबके विकास के साथ संवैधानिक बाद्धयताओं के साथ, खीच देश के विकास में राज्यों और उन राज्य के मुख्यमंत्रियों की अहम भूमिका को रेखांकित किया है। यह राज्यों व उन मुख्यमंत्रियों को समझने वाली बात है। जो स्वार्थ परख राजनीति या स्वयं के निहित स्वार्थो के चलते राज्य का विकास अवरुद्ध कर प्रदेश की आवाम को विकास से वंचित रखते हुये आये है। उन्हें संवैधानिक ढांचे की हकीकत और जनाकांक्षायें को सामने रख, उनके सुनहरे सपने पूर्ण करने की दिशा में आगे बढऩा चाहिए। 

देश के प्रधानमंत्री जी ने केन्द्र सरकार की मंशा में अहम, अंग जोड़ते हुये एक ऐतिहासिक लोकतांत्रिक ढांचा विकास की खातिर, खड़ा करने की जो मंशा जाहिर की वह भारतीय लोकतंत्र के लिये ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। बशर्ते सत्ता की लोकतांत्रिक मजबूरियों से इतर राष्ट्र व जनहित में उसका इस्तेमाल हो। 

अगर वाक्य में प्रधानमंत्री जी को, अपने पूर्वज नेताओं, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों तथा 125 करोड़ देश वासियों की आशा, आकांक्षा और उनके सुनहरे सपनो के भारत निर्माण करना है। तो उन्हें निश्चित ही कुछ ऐसे निस्वार्थ राष्ट्र भक्त जनसेवा में आस्था रखने वालों की आवश्यकता होगी, जो देश के लिये अपने परिश्रम की पराकाष्ठा कर परिणाम दे सके। 

क्योंकि एक सैनिक के लिये अत्याआधुनिक हथियार से ज्यादा उसके अन्दर का जज्बा जरुरी होता है। क्योंकि साधन, संसाधन आध्यात्म, तकनीक, विज्ञान तो सहायक हो सकते है। मगर लक्ष्य हासिल करने जज्बे की जरुरत होती है जिससे लक्ष्य को भेदा जा सके। जब किसी भी व्यक्ति में लक्ष्य प्राप्ति की आकांक्षा जज्बा और लक्ष्य प्राप्ति का विश्वास हो तो परिणाम अवश्य आते है।  

जिस तरह से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विदेशी नीति को लेकर देश में विश्वास जगा है और बेहतर कूट नीतिक नीति अपना विश्व पटल पर देश की स्थिति को मजबूत किया गया है उसको और बेहतर बनाने हमारे आध्यात्म और सांस्कृतिक धरोहर का बेहतर योगदान हो सकता है। 

जिस तरह से जनधन, बीमा, स्वच्छता, ग्रीन इंण्डिया, स्केल इंण्डिया, मेकइन इंण्डिया, प्रधानमंत्री सिंचाई, बिजली, सडक़ तथा बीज, बाजार तक के लिये शुरुआत हुई है। जिस तरह से भ्रष्टाचार, कालाधन के लिये नोट बंदी, जीएसटी की शुरुआत हुई है। छोटे-छोटे रोजगार के लिये मुद्रा बैंक महिला शक्तिकरण सहित सीमा से लेकर सागर तक और सायबर से लेकर स्पेश तक सुरक्षा की बात हुई है, निसंदेह इस पर किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। 

देखा जाये तो प्रधानमंत्री द्वारा लक्षित परिणाम देश के सामने लाना कोई बड़ी बात नहीं, मगर जो ऐतिहासिक मंशा प्रधानमंत्री जी ने लाल किले की प्राचीर से लोकतंत्र को संचालित करने तंत्र के बजाये लोक से शुरु करने की है। वह बड़ी ही संवेदनशील है और उसे सजग रहकर सत्ता की लोकतांत्रिक मजबूरियों से इतर पूरा करना होगी, बरना परिणाम उल्टे भी हो सकते है। 

बहरहाल प्रधानमंत्री ही नहीं देश को भी यह चिन्ता सामने रखनी होगी कि जिस तरह से हमारी खादय, स्वास्थ, शिक्षा नीति जल नीति के चलते आम भारतीय मानव के शरीर की बनावट में बदलाव आया है। जैसा कि देश एक पत्रकार ने इस ओर ध्यान बटाया कि आम भारतीयों के कन्धे कभी बड़े मजबूत हुआ करते थे जो ढीले नजर आते है। इसी में अगर में जोड़ दूं कि कन्धा ही नहीं कमर पर भी प्रभावित हुई है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 

और इसमें ऐतिहासिक सुधार तभी संभव है जब हमारी खादय, स्वास्थ, शिक्षा, जल नीति को सूचकांक के आधार पर व्यवहारिक तौर पर समीक्षा कर सांस्कृतिक आधार व प्राकृतिक सिद्धान्तों का पालन करते हुये बनाई जाये और यह हमारे देश में निर्णय लेने वाली सरकार के बीच स भव है, मगर लाख टके का सवाल यहीं है कि करे कौन। 

क्योंकि अगर अकेले अध्यात्म, विचार विधाओं से ही काम चल जाता तो सारा विज्ञान, तकनीक का भारत आज गढ़ होता। शायद हम हमारे महान ग्रन्थ, गीता, रामायाण से सेकड़ों वर्ष बाद भी कर्म व कर्तव्य निर्वहन, जबावदेही का सही ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके और यहीं कारण है कि हम आध्यात्म, विज्ञान पर बड़े-बड़े भाषण, ग्रन्थों में तब्दील किताबों के अध्ययन पर तो अपनी नस्लों से अध्ययन की उम्मीद करते है मगर वर्तमान में विरासत को सजो जिन्दा रहने ही नहीं बेहतर जीवन निर्वहन के न तो उन्हें सोच, साधन, संसाधन एवं स्वच्छंद वातावरण नहीं दे पाते है। जिसके वह हकदार है और इसीलिये हम प्रयास, परिणाम और पीढ़ा में उलझे नजर आते है। काश नव भारत निर्माण की दिशा में हम सार्थक पहल कर, नि:स्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर पाये और एक निर्णायक युग में हर वो नागरिक अपना योगदान दे पाये, जिसकी अपेक्षा आजादी के 70 वर्ष बाद भी उसे अपनी सरकारों, संस्थाओं और समाज से रही है। 
जय स्वराज

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Village Times: प्रयास, पीढ़ा, परिणामों से व्यथित देश, दिशा तो ठीक, मगर दशा पर संदेह
प्रयास, पीढ़ा, परिणामों से व्यथित देश, दिशा तो ठीक, मगर दशा पर संदेह
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