पतन की पराकाष्ठा और चर्मोत्कर्ष पर अज्ञानता

विलेज टाइम्स समाचार एजेन्सी : अगर यो कहे कि हमारे महान राष्ट्र की महान लोकतांत्रिक व्यवस्था में विगत 32 वर्षो के महाविनाश के बीच पनपी पतन की पराकाष्ठा और चर्मोत्कर्ष पर पहुंची अज्ञानता ने लोगों के समझने की क्षमता पर इतना गहरा प्रहार किया है कि समुची व्यवस्था ही कलफ उठी, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। 

विगत 32 वर्षो में भारतीय व्यवस्था के अन्दर दौलत, शौहरत के स्वार्थो पर सवार भ्रष्टाचार के रास्ते नैतिक पतन और अज्ञानता का जो नासूर बढ़ा उसने व्यक्ति, परिवार, समाज, राजनीति संवैधानिक व्यवस्था को अपने प्रभाव से अछूता नहीं छोड़ा और जब तब इसका असहनीय दर्द उस पीढ़ा का एहसास भी कराता रहा जिसे हम चिकित्सीय भाषा में नासूर कहते है। मगर र्दुभाग्य हमारा कि इन 32 वर्ष में बड़े-बड़े उस्ताद, हकीम इस मर्ज को नहीं समझ सके। आज जब संगठित हकीमों की फौज ने अपने बड़े उस्ताद की देखरेख में मर्ज ढूढ़ निकाला है। तो उस नासूर के फूटते ही उसमें निकलती मवाद और उसकी महा सड़ांध से अच्छे-अच्छे हकीम, उस्तादों के होश फा ता हो हलक सूख रहे है। 

देखा जाये आज भारतीय समाज, व्यवस्था में भ्रष्टाचार ही वह बड़ा नासूर है जिसने नैतिक पतन के रास्ते समाज और व्यवस्था में पैठ बना स्वार्थ, अहंम, अहंकार को पोषित कर समुचा ढांचा ही चरमरा दिया है। जहां सिर्फ और सिर्फ आधे, अधूरे ज्ञान या स पूर्ण अज्ञानता का नाच खुलेआम चल रहा है, वहीं  नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व्यवस्थागत या व्यक्तिगत जीवन मूल्य खून के आंसू रोने पर मजबूर है। या फिर जागी नई उ मीद में आशा लगा एक बार फिर से खुशहाल, स पन्न जीवन जीने की बाट जो रहे है, कि कभी तो कुछ ठीक होगा और उनकी आशा आकांक्षाओं के प्रवाह को स्वच्छंद जल धारा की तरह बहने का मौका मिलेगा, न कि सड़ांध मारते गड्डे, नालों की तरह उनकी आशा आकांक्षाओं को दम तोडऩा होगा। बेहतर हो हताश, निराश, मायूस देश के 130 करोड़ लोगों की आशा आकांक्षा अनुरुप व्यवस्था में सुधार के साथ ऐसे पु ता इंतजाम और व्यवस्था हो जो राष्ट्रवासियों को यह दिन न देखना पड़े।
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