इन्सानियत की रक्षा के लिये आत्म रक्षा भी आवश्यक

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार एजेन्सी : शान्ति, अहिंसा की भूमि से उठने वाले संदेश कभी हिंसक नहीं हो सकते। अगर इन्सानियत की रक्षा के मार्ग के कंटक जब हिंसा की भाषा समझे तो इन्सानि यत की खातिर उचित कदम उठाना ही मानव धर्म हो जाता है। फिर वह इन्सानियत की खातिर आत्म रक्षार्थ हिंसा, असहयोग, सविनय अवज्ञा या फिर सत्याग्रह ही क्यों न हो। स्वार्थवत शक्तिशाली सत्ताओं का विरोध कर ऐसी सत्ताओं से अवश्य लोहा लेने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। 

क्योकि हमारी स यता, संस्कृति जीवन मूल्य हमें और हमारी महान कौम को यहीं संदेश देते है कि हम हमेशा से आध्यात्म, परिवर्तन व सृजन को आत्मसात कर विश्व को इन्सानियत का संदेश और इन्सानियत की दुश्मन बनी स्वार्थवत शक्तिशाली सत्ताओं को जरुरत पढऩे पर सबक सिखाने वाले भी रहे है। हमारा इतिहास गवाह है कि सत्तायें कितनी भी शक्तिशाली और साम्राज्य कितने ही बड़े क्यों न रहे हो, भारतीय कौम ने हमेशा ही संकट की घड़ी में मानवता व इन्सानियत का साथ नहीं छोड़ा और सफल संघर्ष किया।

मगर आज एक बार फिर से हम विदेशी शक्तिशाली सत्ताओं, साम्राज्यों को अपने फलते फूलते महान भारतवर्ष के खिलाफ ही नहीं, समुची विश्व की इन्सानियत के खिलाफ उनके खतरनाक मंसूबे मेहसूस कर रहे है। मगर ऐसी ताकतों को यह समझना होगा कि जब हजारों वर्षो में न तो हम डरे और न ही हम मिटे, ऐसे में उंगलियों पर गिनी जाने वाली कुछ विदेशी ताकतें हमें क्या डिगा पायेगी। जो सोते जागते हमें हमारे महान राष्ट्र को कोसते या बुरा कहते नहीं थकते। 

ऐसी ताकतों को समझना होगा कि भारतवर्ष अगर अहिंसा, शान्ति का पुजारी है तो इन्सानियत का भी उतना ही बड़ा रक्षक है जिसका अनादिकाल से सत्य, अहिंसा, शान्ति और न्याय के साथ इन्सानियत के लिये मिटने-मिटाने का भी जज्बा रहा है और हर मर्तबा जीत हमारी ही हुई है फिर काल, खण्ड जो भी रहे हो। 

बेहतर हो भारत के खिलाफ शैतानी मंसूबे पालने वाली स्वार्थवत सत्तायें इस सच्चाई को समझ भारत के बारे में अपनी सोच दुरुस्त करे। यहीं समुचे इन्सानियत और मानवता के हित में होगा जैसी कि हमारी प्रकृति अनुसार मान्यता और सिद्धान्त है कि जियो और जीने दो। 
जय स्वराज
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment