सिर्फ विरोध के लिये विरोध सृजन के खिलाफ प्रधानमंत्री जी की विदेश यात्रायें

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार एजेन्सी : जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री देश की बागडोर  स हाल विदेश यात्राओं में 130 करोड़ का प्रतिनिधत्व कर विश्व विरादरी में भारत का नया स्वरुप प्रस्तुत कर रहे है। उसके हालिया परिणाम फिलहाल सामने नजर न आये मगर इन यात्राओं के दूरगामी परिणाम अवश्य आम भारतीय को आने वाले समय में दिखेगें। संभवत: स्व. पण्डित जवाहर लाल नेहरु, स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी के पश्चात यह पहला मौका है जब किसी प्रधानमंत्री द्वारा विश्व विरादरी में एक नया आयाम तय करने की कोशिश की जा रही है। 

अमेरिका से लेकर रुस और आस्ट्रेलिया से लेकर अरब और अफ्रीका से लेकर यूरोप तक देश के प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रायें कर चुके है। फिलहाल कुछ हासिल हो या न हो मगर विश्व बिरादरी में एक लंबे अन्तराल के बाद भारत की चर्चा अवश्य सरगर्म है, जो राष्ट्रहित में ही है। 

ऐसे में प्रतिद्वन्दी या स्वयंभू पड़ोसी राष्ट्रों की पीढ़ा स्वभाविक है जो विरोध स्वरुप समय-समय पर राष्ट्र वासियों के सामने आती रहती है। अब अगर ऐसे में एक पुश्तैनी प्रतिद्वन्दी की सह पर अपने व्यापरिक स्वार्थबस एक अन्य हमारा पड़ोसी मुल्क हमें किसी भी बहाने हड़काता है तो हमें इससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं होना चाहिए। कहते है कि हमारे संस्कारों में भी यह है कि जब भी कोई उकसाऊ या भडक़ाऊ हरकत करे तो उसकी हरकत पर धैर्यपूर्वक विचार करना चाहिए और उसका सटीक जवाब किस मंच या किस जगह, किस समय पर क्या होना चाहिए यह सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही हमें यह भी तय करना चाहिए कि कूटनीतिक तौर पर अपरोक्ष रुप से क्या और बेहतर तरीके हो सकते है इस तरह की हरकतों का जबाव देने, उन पर विचार करना चाहिए न कि किसी प्रकार के जबानी जमा खर्च में उलझना चाहिए। 

क्योंकि हम एक संप्रभु राष्ट्र है और हमारे राष्ट्र की बेहतर सुरक्षा की संस्थागत व्यवस्था भी है उन संस्थाओं का अपना उत्तरदायित्व है और वह संस्थायें अपने कर्तव्य निर्वहन में देश ही नहीं विदेशी धरती पर भी कभी पीछे नहीं रही। हमें आज यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस रास्ते हम चल निकले है उस रास्ते पर हमें सत्य, अहिंसा, शान्ति, सुरक्षा के मार्ग पर चलने से कोई नहीं रोक सकता। 

मगर इस बीच हमें स्वामी विवेकानन्द जी के बौद्धिक शौर्य और पण्डित नेहरु के गुट निरपेक्ष सिद्धान्त को भी नहीं भूलना चाहिए एक जिम्मेदार राष्ट्र के रुप में अपनी जबावदेहियों का निर्वहन करना चाहिए वह उत्तरदायित्व राष्ट्र के अन्दर भी हो सकता है और बाहर भी। साथ ही पड़ोस राष्ट्रों में भी यह स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि न्याय सत्य, अहिंसा, शान्ति का संदेश समुचे विश्च में प्रसारित करने वाला राष्ट्र कभी अतिक्रामक, अन्यायी और अहिंसक आक्रान्ता नहीं हो सकता। 

बहरहाल प्रधानमंत्री जी की यात्राओं की दिशा, दशा और पूरी संवेदनशीलता के साथ रिफोर्म या जरुरत अनुसार राष्ट्र को स्वयं तैयार होने, करने की गति ठीक रही तो राष्ट्र को सुखद, सक्षम परिणाम मिलना स्वभाविक है। मगर इस सब के बीच विपक्ष को भी सत्ता पक्ष की भांति पूर्ण गंभीरता और अपने अस्तित्व के लिये सृजनात्मक रुख रखना अतिआवश्यक है। जिससे हमारा महान राष्ट्र विश्व विरादरी में अपनी अहम भूमिका निभाने में कभी असफल अक्षम साबित न हो, क्योंकि प्रकृति ने हमें सबसे अधिक सफल, सक्षम राष्ट्र के रुप में विकसित किया है।
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