प्रधानमंत्री की चिन्ता उचित, अशिक्षा मुक्त भारत ही दिला सकता है, समस्याओं से निजात

व्ही.एस.भुल्ले : कहते है शिक्षा ही संपूर्ण  समस्याओं का वह विधान और निदान है जिसमें सारी समस्याओं का हल और ऐहसास है जिन शिक्षा विदों की, शिक्षा नीति का दंश हमारा भारतवर्ष सेकड़ों वर्षो से भुगत रहा है जिस शिक्षा नीति के कारण महान भारत का महान नागरिक सारा कुछ होने बावजूद भी कलफ, बौद्धिक रुप से कुंद और बेरोजगार भटक रहा है। अगर हमारी मूल शिक्षा नीति का पुर्न निर्माण हो जाये तो अशिक्षा मुक्त भारत फिर से शिक्षित हो, संपन्न, खुशहाल और विश्व की महाशक्ति बन सकता है। समुचे विश्व का इतिहास गवाह है कि या तो शिक्षाविद या फिर उन राष्ट्रों की महान शिक्षा नीतियों ने उन महान राष्ट्रों को महान बनाया है, जहां शिक्षा विद या शिक्षा और विद्वानों का सत्ता ने सम्मान, सरंक्षण दे, उनका संवर्धन किया है। 

मगर यह हमारे महान राष्ट्र का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि 1947 से पहले तो हम गुलाम थे ही, तब भी हमारी शिक्षा ठीक थी मगर 1947 के बाद भी हम कोई ऐसी शिक्षा नीति बनाने में अक्षम व असफल रहे जिसमें भारत की आत्मा बसती है। र्दुभाग्य हमारा यह भी है कि देश में एक राष्ट्रवादी सरकार के रहते भी हम अपनी शिक्षा नीति के माध्यम से अपना सुनहरा भविष्य नहीं गढ़ पा रहे है या आज तक उसकी 70 वर्षो में शुरुआत ही नहीं कर सके। र्दुभाग्य हमारा यह भी है एक विचार विशेष की समय-समय पर सत्ता व वैचारिक कट्टरता के चलते आज भी हम उन महान शिक्षा विद शिक्षक या विचारो को व्यवस्था में न तो कोई स्थान दे सके न ही अपनी मूल शिक्षा का संरक्षण संबर्धन कर सके। 

अगर सत्ता या सरकार के लोग वाक्य में ही इस मुल्क को संपन्न, खुशहाल और विश्व की महाशक्ति के रुप में अहिंसा और आध्यात्म के रास्ते देखना चाहते है। तो उन्हें यह समझना होगा कि आत्म व सत्य की रक्षा के लिये सैद्धान्तिक हिंसा, हिंसा नहीं क्योंकि आत्म रक्षा भी एक अहिंसा ही होती है। फिर व्यवस्थागत माध्यम जो भी हो, भारतवर्ष के धर्म ग्रन्थ गवाह है और उनकी प्रमाणिकता हमारे सामने है। 

मगर विधा, विद्वान की कमजोरी उसका मान-सम्मान, स्वाभिमान होता है। जिनकी शिक्षा हमेशा से हमें प्रकृति और उसके सिद्धान्त बताते आये है। फिर काल खण्ड जो भी रहे हो और आजाद भारत में सरकारें जिसकी भी रही हो। आज भी उनकी प्रमाणिकता है। मगर आज जरुरत इतिहास के पन्ने पलटने और उनका विश्लेषण करने की है। 

जो लोग यह कहते है कि एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, कहावत सही गलत दोनो ही हो सकती है। मगर कुछ मामलों में एक ही गुणवत्ता किसी वस्तु विशेष की समकक्षी हो तो वह एक साथ फूटने तैयार रहते है और फूटते भी है। अगर जीव जगत में दे तो शेर आज भी वह सत्य है जो अकेला रह किसी का दखल अपने क्षेत्र में पसन्द नही करता है जिसे जंगल का राजा कहते हैै अगर वह टेने, झुण्ड में न भी रहे अगर कोई वफादार साथी है तो शिकार वह भले ही अकेले करे। मगर जीवन जीने या सर्वकल्याण का गुण उसके इस कर्म में प्रकृति अनुसार स्पष्ट दिखाई देता है जो उसके कई अघोषित साथी अवश्य बना देते है। 

यहीं गुण राज सत्ता का भी मूल मंत्र होता है जिसमें राष्ट्र व जनकल्याण छुपा रहता है फिर चाहे वह व्यक्ति परिवार, समाज, राष्ट्र हो या फिर जीव जगत सभी दूर यहीं सिद्धान्त काम करता है। 
जय स्वराज
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