कलूषित राज-नीति से कैसे हो कल्याण...........तीरंदाज ?

व्ही.एस.भुल्ले : देखा जाए तो देश की राज-नीति से राष्ट्र व जन कल्याण का इतिहास भरा पड़ा है जब-जब जिस-जिस राज की नीतियां अपनी स यता संस्कृति उच्च जीवन मूल्यों के सहारे पारदर्शी व पूर्व आकलन के आधार पर रही है वहां जन व राष्ट्र कल्याण ने हमेशा ही नैतिकता के उच्च मापदण्ड स्थापित किये और ऐसे राष्ट्र व राज्यों की गाथा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से टंकित है। मगर जिन राजों की नीतियां कलुषित कष्टकारी अत्याचारी अहंकारी रही हैं वह भी इतिहास में श्याम श्वेत अक्षरों में लिपिवद्ध है। मगर भैया मने, हारे मगज का, कै करुं, जो हारे को शुकून से नहीं जीने देता। 

लूट, बलात्कार, घोटाले, भ्रष्टाचार तथा प्रायोजित शिष्टाचारी भाषणों से भरे अखबार व बेवजह के मुद्दों पर सुपारी किलरों की तरह टीव्हीयों में आरोप-प्रत्यारोपों की बौछारें तथा बेसब्र भीड़ की भयाभयता से सरेआम सडक़ों पर कुटती मानवता को देख हारा तो कलेजा मुंह को आवे। अब तो तने ही बता कि हारे जैसा गांव, गरीब, पीडि़त वंचित अब किस दर जा अपनी छाती कूटे, जो हारा न सही कम से कम हारी आने वाली पीढ़ी का ही कल्याण हो जाये और एक मर्तवा फिर से हारा महान भारत का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में आजाद भारत में लिखा जाये। 

भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी देशभर के राष्ट्र भक्तों की फौज जो थारे जैसे गांव, गरीब, पीडि़त, वंचितों की खातिर पूरे 70 वर्षो से कल्याण में जुटी है। और अब तो समुचे देश में प्रभु राम भक्तों की सरकारें धीरे-धीरे बन दिन रात एककर रही है। सो जरा सब्र तो रख, सब ठीक हो जायेगा। गांव-गांव दूध और गरीबों को घर तथा पीडि़त वंचितों को भी हिसाब किताब करने का पूरा मौका दिया जायेगा। 

भैया- मने न लागे कि अखबार टी.व्हीयों में आरोप प्रत्यारोपों की कुत्ताझपट से कुछ निकल पायेगा। गर ऐसा ही कुछ और दिन चलता रहा तो काड़ू बोल्या गांव, गली, गरीब, वंचित, पीडि़तों की फौज देख थारा तो थारा, थारी भाभी का कलेजा कांप जायेगा। 

भैये- चुप कर, गर सुन लिया किसी केडर आड़े ने तो उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम वाले तक बड़े-बड़े अघोषित सूरमा, सम्राट, युवराज, सुल्तानों का कचूमर निकल रहा है। केडर आड़ों की धमक के आगे अब गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचित ही नहीं पड़ोसी देशों में बैठे दुश्मनों का भी हलक सूख रहा है। 

भैया- मगर हारे जैसे नंगे, भूखे ब्लेक इन व्हाईट श्वेत, श्याम, धीमी गति के समाचार, अखबार आड़ों का कोई क्या उखाड़ लेगा। 

भैये- मुंये चुपकर, जब बड़े-बड़े मल्टी कलर, देश, भाषा, संख्या में नंबर वन, सुबह और शाम, ऊपर और नीचे, सीधे और आड़े 20 मिनिट 90 तो 10 मिनिट में 50 धनाधन खबर देने वाले चैनलों तक की बोलती बंद है व हुक्का भराई में व्यस्त हैं। तो ऐसे में थारे जैसे चिन्दी-पन्ने वाले की बिसात क्या? जो हारे महान कैडर आड़ों पर उंगली उठा सके। जय-जय श्रीराम 

भैया- मने समझ लिया थारा इसारा यह तो वक्त की बलहारी है जिससे दुनिया भी हारी है। कहते है जब वक्त बुरा हो तो समझदारी इस बात में है कि समझदार को कभी उसके आड़े नहीं आना चाहिए। वरना मार्ग के कंटक बनने का मंसूवा पालने वालों का कचूमर उड़ते देर नहीं लगती। 

अब देखों न एकक्षत्र समुचे देश या प्रदेशों में राज करने वालों की क्या हालत बनी है। कहीं भगदड़ तो कहीं स्वार्थो की हांडी चढ़ी है। मगर र्दुभाग्य कि हम गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितो का, कि 70 वर्ष बाद भी हारी एक मात्र न तो महान शिक्षा नीति बनी है और न ही संकलन नीति बन सकी है। सो मने तो अब स्वराज का ही सहारा है, जिसके सहारे ही अब हारा महान भारत खुशहाल संपन्न भारत वर्ष बनने वाला है।
जय स्वराज
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