गांव, गरीब, पीडि़त, वंचित और अहम, अहंकार का कहर

व्ही.एस.भुल्ले : अगर अन्याय, अत्याचार दमन के रास्ते दुनिया चलती होती, तो आज, प्रभु श्री राम, श्री कृष्ण नहीं, रावण, कंस जैसे राक्षस पूजे जाते, मगर अहंम अहंकार में डूबे तथा कथित प्रभु राम व राष्ट्र भक्तों को कौन समझायें कि दुनिया आज तक प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप जियो और जिन्दा रहने के सिद्धान्त पर चल, जिन्दा बनी हुई है, न कि अन्याय, अत्याचार, दमन के रहमो करम पर। काश इतनी सी बात स्वार्थी, महात्वकांक्षी व्यक्ति, संगठन, संस्थायें समझ पाये। 

आज सच तो यह है कि गांव, गरीब, पीडि़त, वंचित, मजबूर मानवता अपनी ही व्यवस्था के बीच, खून के आंसू रोने पर मजबूर है। आज चिन्ता उसे अपनी नहीं, कि उसने क्या खोया, क्या पाया, उसे तो चिन्ता आज इस बात की है कि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को है। वह विरासत में कौन से जीवन मूल्य, संस्कृति, संस्कार तथा कैसे संसाधन और  कैसी व्यवस्था  व वातावरण विरासत में छोड़ कर जायेगें। 

मगर अन्याय, अत्याचार, अहंम, अहंकार के काकस में फसे मजबूर लोग अब क्या करें। उनके सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्र आज यही है। मगर आज हमें यह नहीं भूलना चाहिए रावण, कंस, सिकन्दर, तुर्क, मुगल, अंग्रेजो के  बाद, हम उस महान भारत वर्ष की सन्तान है। जिसका अस्तित्व ही नहीं, समुची पहचान आज भी आज भारत के 130 करोड़ के लगभग लोगों के रुप में मौजूद है। मगर हमारे महान देश का सौभाग्य यह है कि भले ही आज कलयुग चल रहा हो, मगर इस घोर कलयुग में भी आज लोगों में उनका आत्म विश्वास तथा विरासत में मिला आध्यात्म उसके जीवन मूल्य, संस्कृति, संस्कार सहित उसक अपना जमीर जिन्दा है।

जिस तरह से धृतराष्ट्र की सभा में बड़े-बड़े सूरवीर सिद्धान्तबादी और धर्मावलंबी राजनैतिक योद्धा चीर हरण के वक्त चुप रहे और स्वयं प्रभु श्री कृष्ण को धर्म की रक्षा के लिये आगे आना पड़ा। मगर र्दुभाग्य कि आज हमारे महान लोकतंत्र में इसका आभाव हमें विचलित करता है। मगर अपने धर्म ग्रन्थ अपनी संस्कृति, संस्कारों के चलते इस महान देश में कुछ लोग आज भी है जो अपने जीवन मूल्य एवं सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लियेे, लोकतंत्र में होने वाली धृतराष्ट्रों की सभा के दर्शक नहीं, वह पक्षीराज जटायू बनना चाहते है क्योंकि बड़े-बड़े बल शाली सिद्धान्तबादी, धर्म व राष्ट्र रक्षको के बीच, गांव, गरीब, पीडि़त, वंचितों की आकांक्षाओं का सरेयाम सेवा के नाम चीरहरण हो रहा है। ऐसे में इनकी रक्षा करने हो सकता है स्वयं प्रभु कृपा करें। मगर प्रभु के महाभारत में दिये संदेश कि मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिए फल की इच्छा नहीं।

अब ऐसे में पक्षीराज जटायू की भूमिका में इस महान राष्ट्र के महान सपूतों को गांव, गरीब, पीडि़त, वंचितों की सेवा के नाम उनकी नैसर्गिक जरुरतों का अपहरण होने से रोकने या तो प्रभु श्री राम और भगवान श्री कृष्ण का इंतजार करना होगा या फिर भगवान श्री कृष्ण के बताये मार्ग पर चल अपना कर्म करना होगा।  

मगर र्दुभाग्य कि कलयुग के चलते फिलहाल प्रभु तो दर्शन देने से रहें और पीड़ा हरने से, मगर जिस दिन पक्षीराज जटायू की तरह प्रभु का आर्शीवाद भारतवर्ष के हर गांव, गरीब, पीडि़त, वंचितों को मिला उसी दिन हमारा महान भारतवर्ष एक मर्तवा फिर से खुशहाल, संपन्न, राष्ट्र बन जायेगा।  
जय स्वराज
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