बेसब्र विरोध लोकतंत्र में घातक

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार एजेन्सी : हम बार-बार बेसब्र विरोध जताते वक्त ये क्यों भूल जाते है कि हम विश्व की एक महान लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंग है जिसको संचालित करने हमारा महान संविधान है और संविधान में उल्लेखित संवैधानिक संस्थायें तथा संविधान को स्वीकार अंगीकार करने वाले सवा अरब से अधिक लोग है। 

मगर जिस तरह से राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक आधार पर बेसब्र व्यक्तिगत, वैचारिक संगठनात्मक, संस्थागत विरोध का दौर जो देश में चल पढ़ा है। वह राष्ट्र ही नहीं समुचे भारतीय मानव सभ्यता, संस्कृति, समाज और सत्ताओं के लिये घातक है। बेसब्र व्यक्तिगत, वैचारिक विरोध उन व्यक्तियों संगठनों को भी उतना ही घातक है जो बगैर सोचे समझे विचार किये व्यक्तिगत या वैचारिक विरोध के लिये ऐड़ी चोटी का जोर लगाने अस्वीकार्य तौर तरीकों को अपनाने तत्पर बने रहते है। 

देश में बढ़ती इस तरह की प्रवृतियों से राष्ट्र व समाज का तो नुकसान हो ही रहा है साथ ही ऐसे संगठन व्यक्ति भी इस घातक प्रवृति का शिकार होने से अछूते नहीं जो स्वार्थ और सत्ता के आगे व्यवहारिक सच को समझने तैयार नहीं और अपने अस्तित्व तक को दांव पर लगाने से नहीं चूकते। 

अगर बेसब्र विरोध से राष्ट्र और समाज का भला होता, तो आज आजादी के 70 वर्ष निकल चुके है इस बीच हमारी कई पीढिय़ां मर खब गई। मगर हम अभी भी खुशहाल संपन्न, राष्ट्र नहीं बन सके, न ही हम हमारी महान सभ्यता, संस्कृति को ही सुरक्षित अक्षुण रख सके और न ही उन्हें संरक्षण दे सके, जिसमें हमारे स्वाभिमान और खुशहाली का राज छिपा है। स्वार्थ और सत्ता के लिये बेसब्र विरोध की प्रवृति आज इस तरह से हमारे सर चढक़े बोलेगी जो हमारे नैतिक, जीवन मूल्यों तक को तार-तार कर देगी शायद हमारे अपनो ने कभी सपने में भी न सोचा होगा। 

देखा जाये तो किसी भी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनगिनत, नैतिक, व्यवस्थागत स्वीकार्य विरोध के मार्ग हो सकते है। मगर हम बगैर त्याग, तपस्या मेहनत किये अपने-अपने लक्ष्य अपनी-अपनी क्षणिक स्वार्थ पूर्ण सिद्धि के लिये केवल जबानी जमा खर्च या हुड़दंग के सहारे उसकी पूर्ति करना चाहते है। जो कभी भी किसी भी स य सुसंस्कृत या शिक्षित, अशिक्षित वर्ग, समाज मेें स्वीकार नहीं हो सकता और देर सवेर ऐसे बेसब्र विरोधों के परिणाम, विरोध के खिलाफ ही मिलेगें। 

अगर इस महान राष्ट्र और इसके नागरिकों को लेकर अगर किसी को भी यह मुगालता है कि देश की आधे से अधिक जनता अभाव ग्रस्त है या अज्ञानी, अस्वाभिमानी है, तो यह ऐसा सोचने वालो की एक बड़ी भूल होगी कि जनता कुछ नहीं समझती और उसकी इस कमजोरी का लाभ उठा, वह इसी तरह विकास और विरोध के नाम सत्ता में भाड़े के भोपुओं के सहारे आते जाते रहेगें। और हम और हमारें इसी तरह सत्ता सुख भोगते रहेगें। तो ऐसे लोग अपनी जानकारी दुरुस्त कर, भारत के अध्यात्म और उसकी संस्कृति, सांस्कृतिक ऐतिहासिक विरासत का अध्ययन अवश्य करें। 

क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह कटु सच होता है कि जो कभी सत्ता में रहते है उन्हें कभी विपक्ष में बैठना होता है और जो कभी विपक्ष में होते है उन्हें जनता से मिले मत के आधार पर सत्ता में बैठना होता है जिसके लिये हमारी महान संवैधानिक व्यवस्था भी है। अगर कोई दल ल बे संघर्ष त्याग तपस्या, संगठनात्मक शक्ति, बल और वैचारिक आधार पर सत्ता में है। तो उसे सरकार चलाने में सकारात्मक सहयोग और नीतिगत विरोध के साथ अपना वैचारिक संगठनात्मक आधार बढ़ाने की दिशा में तेज गति से जनता के बीच कार्य करना चाहिए न कि बेसब्र विरोध जता हंसी अपमान और बार-बार हार का कारण बनना चाहिए। 

हो सकता है कई व्यक्ति या संगठन, भ्रामक प्रचार, धन, बहुबल या फिर षडय़ंत्रपूर्ण आचरण के चलते सत्ता तक पहुंच जाये और सत्तासीन हो जाये। मगर ऐसे में व्यक्ति या संगठन का धैर्य, आचरण, नैतिकता तथा राष्ट्रीय धर्म ही सत्ता से दूर लोगों की ताकत बनती है ऐसे में जनता भी सत्ताधारी संगठन की नीतियों, आचरण का मूल्याकंन करती रहती है, फिर जल्दबाजी क्यों? फिर बैजान, स्वार्थ परख मुद्दों पर बेसब्र विरोध क्यों? 

लोकतंत्र में किसी भी विरोधी दल या संगठन को यहीं मौका होता है जब विरोध करने वालो को सीधे जनता के बीच अपने नैतिक, सिद्धान्तिक मूल्यों का खुलकर प्रदर्शन कर, अपनी स्थिति मजबूत कर, जीवन व राष्ट्रीय मूल्यों के लिये विरोध करना चाहिए। बरना विरोध के लिये विरोध और सत्ता के लिये स्वार्थो का यह मुलयुद्ध ऐसे ही चलता रहेगा और पीढि़त, वंचित आभाव ग्रस्त जनता भ्रमपूर्ण माहौल पर कभी इधर तो कभी उधर देख, मजबूरी में अप्रत्याशित निर्णय देती रहेगी। 

क्योंकि किसी भी राष्ट्र के नागरिक की जितनी जबावदेही सुकून से स्वयं के जीवन निर्वहन की होती है उसका उतना ही उत्तदायित्व, उस राष्ट्र और उसकी महान व्यवस्था के प्रति होता है। जहां वह अपना खुशहाल जीवन जीने के लिये संघर्ष करता है। देखा जाये तो हमारे महान राष्ट्र की महान जनता ने अनादिकाल से अपने महान निर्णयों से समुचे विश्व ही नहीं मानव जगत को चौकाया है और आगे भी वह ऐसे ही चौकाती रहे, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। इसीलिये धैर्य ही धर्म और संघर्ष ही कर्म होना चाहिए। 
जय स्वराज 

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