दिशा तो ठीक मगर दशा से दहशत में लोग

व्ही.एस.भुल्ले, स्व.पंण्डित जवाहर लाल नेहरु, स्व. इन्दिरा गांधी, स्व. राजीव गांधी, स्व. पी.वी. नरसिंह राव एवं श्री अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह सरकार से लेकर अब नरेन्द्र मोदी सरकार में जो राष्ट्र हित में निर्णय हो रहे है भले ही वह दूरगामी हो। मगर देश में हो रहे बड़े-बड़े निर्णयों के माध्यमों से हो रहे परिवर्तनों को देख देश की दिशा पर तो संतोष व्यक्त किया जा सकता है। मगर परिणामों को लेकर देश की दशा पर गर्व मेहसूस करना फिलहाल दूर की कोणी है। 

अगर आज मोदी सरकार की विदेश नीति व आन्तरिक नीति के तहत कुछ निर्णयों जैसे उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम तथा आन्तरिक सुरक्षा सहित तुष्टिकरण के खात्मे को लेकर जो वातावरण देश में तैयार हो रहा है उसकी दिशा तो ठीक कही जा सकती है मगर हालातों की दशा देख, लोग स्वयं को दहशत जदा मेहसूस करने से नहीं चूक रहे। जिस  तरह से पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में राष्ट्रहित में निर्णय होते रहे है उन निर्णयों ने भी देश के लिये संजीवनी और सारथी का कार्य किया है। 

फिर चाहे वह स्व. पं. नेहरु का औद्योगिकीकरण या आर्थिक समाजवाद रहा हो या फिर स्व. लाल बहादुर शास्त्री की हरित क्रान्ति और जय जवान, जय किसान का नारा रहा हो या फिर स्व. इन्दिरा गांधी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम से लेकर प्रायवेट बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार तथा स्व. राजीव गांधी का नगरीय एवं पंचायतीराज सहित शिक्षा तकनीक के क्षेत्र के निर्णय हो या फिर स्व. नरसिंह राव सरकार में आंतकवाद, भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण के खिलाफ स त निर्णय, यूं तो अटल सरकार में भी प्रधानमंत्री सडक़ और नदी जोड़ो जैसी योजनाओं पर निर्णय हुये वहीं मनमोहन सरकार में परमाणु संधि से लेकर सूचना अधिकार, मनरेगा, शिक्षा के अधिकार, खादय सुरक्षा गांरटी जैसे निर्णय इस बात के प्रमाण है कि देश में सरकारों के निर्णयों के माध्यम से देश में परिवर्तन का दौर चलता रहा है। 

मगर सन 1989 से लेकर 2014 तक जो क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ उसने राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा नुकसान ही नहीं किया है बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को कमजोर भी किया है। अगर हम यो कहे कि इस दौरान गठबन्धन की राजनीति के चलते समाज व राष्ट्र विरोधी निर्णय सहित स्वार्थवत सत्ताओं बल मिला है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। जिसने विगत 25 वर्षो में देश की राजनीति की दिशा, दशा ही नहीं उसकी आत्मा को झंझकोर रख दिया। जिसके दुष्परिणाम कई रुपों में आज देश के सामने है और वह देश की नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है। जिसमें तेजी से सुधार की तत्परता ने देश को दिशा तो दी है मगर दशा में कोई खासा सुधार फिलहाल नजर आ रहा। 

ये अलग बात है कि नरेन्द्र मोदी सरकार में विदेश नीति से लेकर आन्तरिक नीतियों में जो निर्णय हो रहे है उसके परिणाम हालिया तौर पर देश के सामने स्पष्ट तौर पर दिखाई न देते हो, मगर देश का भविष्य बेहतर होगा इसे नकारा भी नहीं जा सकता। 

फिलहाल एक ओर नये निर्णय को लेकर जो सुगबुहाहट केन्द्र सरकार ने प्रशासनिक मशीनरी में सुनाई पड़ रही है वह अति संवेदनशील हो सकती है। बेहतर हो सरकार इस तरह की शुरुआत अगर सरकार के स्तर पर देश की प्रबुद्ध और समर्पित कौम का इस्तेमाल राष्ट्र हित में करें और बगैर प्रशासनिक ढांचे से छेड़छाड़ किये ऐसी नवीन नीति का निर्माण करे जिससे न तो प्रशासनिक ढांचा प्रभावित हो और कार्य भी तीव्र गति से पूरी प्रमाणिकता और जबावदेही के साथ हो। क्योंकि आज सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार की है जिसने समाज के अन्दर तक पैठ बना एक नई संस्कृति और पर परा को  जन्म दे रखा है। जितनी जरुरत भ्रष्टाचार को उच्च स्तर से खात्मे की है उतनी ही आवश्यकता निचले स्तर पर भी खात्मे की है और यह तभी स भव है जब इसकी शुरुआत शिक्षा, समाज एवं सरकार के स्तर पर एक साथ की जाये। क्योंकि धन के प्रति बढ़ता लोगों का मोह और भ्रष्टाचार की पनप चुकी प्रवृत्ति राष्ट्र और समाज में इतनी गहरी जड़े जमा चुकी है कि उनसे पार पाना इतना आसान नहीं होगा। जिसके लिये जरु री है कि नैतिक, सामाजिक मूल्यों के साथ राष्ट्रीय मूल्यों के मान-स मान एवं स्वभिमान की दिशा में बड़े पैमाने पर शुरुआत हो और यह तभी स भव है जब एक व्यापक खाके के साथ राष्ट्र निर्माण में जुटे लोग पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ सबका साथ, सबके विकास के मूल मंत्र का बगैर किसी भेदभाव के पालन हो। 
जय स्वराज 
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