संस्कृति, परंपरा के आभाव एवं चरित्र निर्माण की असफलता के चलते बढ़ी भीडऱाज की विभिसका

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स: जब कहीं भी देश में, हम रैप, गैंग रैप सरेयाम छेड़छाड़ एक तरफा हैवानियत, हवस, हिंसा, मारपीट, हत्या, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का नंगा नाच तथा सामूहिक भीड़ की बेसब्र हिंसा देखते सुनते है और जब मीडिया के विभिन्न माध्यम हमें यह एहसास कराते है कि हम कैसे समाज के अंग व कैसी व्यवस्था के बीच हम रह रहे है। तो हमें ऐसे महान भारतवर्ष के नागरिक होने पर शर्म भी आती है और पीढ़ा भी होती है। आखिर हम इस महान भारतवर्ष के महान नागरिक कैसे इतने निष्ठुर अव्यवहारिक, असंस्कारी, चरित्रहीन, भ्रष्ट हो सकते है जिनके पूर्वजों की बनाई संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों पर विश्व भर के लोग गर्व करते है। 

जिस महान देश में राष्ट्र भक्ति, समाज सेवा की जहां अनेकों अनेक मिशाल कायम हो, ऐसे में उस महान राष्ट्र की महान पीढ़ी कैसे अपना चरित्र, संस्कार, संस्कृति छोड़ पथ भ्रष्ट हो सकती है। कैसे वह महान समाज मुर्दा हो सकता है जिसके रहते उन्हीं के सामने उनकी सर्वोच्च स मान प्राप्त माता, बहिनों, बच्चियों को सरेयाम सडक़ों पर अपमानित कर हत्या कर दी जाती है। 

शायद 70 वर्षो में नहीं मात्र 30 वर्षो में हमारी सत्ता व संवैधानिक संस्थाओं ने हमें कहां से कहां पहुंचा दिया जिसमें न तो हमें व्यक्तिगत, न ही सामाजिक और न ही हम राष्ट्रीय चरित्र निर्माण कर सके और अपनो के ही हाथों हम असफल और अक्षम साबित हो गये। समाज और संस्थाओं के रहते देश में घटते इस तरह के घटनाक्रमों को देख दुख भी होता है और दर्द भी, जिसमें अहम बात यह है कि दर्द देने वाले और दर्द सहने वाले भी हमारे अपने है। 

ऐसे में हम महान भारत वंशियों का धर्म और कर्म भी होना चाहिए कि हम व्यक्ति ही नहीं, समाज और राष्ट्र के अन्दर वह राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करे जिसके लिये महान भारतवर्ष को जाना जाता है। जिसकेे लिये हम व्यक्ति से व्यक्ति, समाज से समाज को और राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोना होगा और वह एक ही रास्ता हो सकता है राष्ट्रीयता का भाव और हमारी संस्कृति व महान पर परायें तथा संस्कार। जिनके सहारे हम हमारी भ्रमित व आने वाली पीढ़ी को चरित्र व संस्कारवान बना सके। जो कि हमारे जीवन मूल्य और संस्कृति रही है जिसमें हमारे देश की माँ, बेटी, बहिन जहां हमेशा स मानित रही है और यह अहम कार्य हमारी शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों के माध्यम से ही हो सकता है।

अगर इस मार्ग की कंटक व हमारी स्वार्थवत संस्थायें, समाज या कोई भी व्यक्ति बनता है तो हमें उसे यह एहसास भी कराने में कतई संकोच नहीं करना चाहिए। कि अगर हमारे महान लोकतंत्र में महान राष्ट्र की माता बहिन, बहु, बेटियाँ सुरक्षित नहीं है तो जो आज महान राष्ट्र निर्माण के कंटक बने हुये है उनका भविष्य भी इस देश में कभी सुरक्षित नहीं रह पायेगा। 

अगर ऐसे लोगों की आस्था भारतीय संस्कृति उसके मान सम्मान स्वाभिमान को बचाने में संस्थागत नहीं रही और जो लोग इन संस्थानों में बैठे है अगर वे देश के कंटकों  को यह समझाने में असफल अक्षम साबित हो रहे है तो ऐसे लोगों के प्रति भी लोगों की आस्था बहुत दिनों तक नहीं रह पायेगी फिर वह किसी भी पद, समाज, संस्था या परिवार से हो। 

बेहतर हो कि हम अपनी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों के सहारे अपने चरित्र निर्माण में जुटे, वरना सडक़ों पर होते भीड़ के फैसलों में शान्ति आध्यात्म का टापू कहे जाने वाले, हमारे महान देश में पीडि़त वंचितों की आस्था कहीं भटक न जाये। जो न तो व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र के हित में, न ही उन लोगों के हित में जो कर्तव्यनिष्ठा से मुंह छिपा अपने उत्तरदायित्वों के साथ गद्दारी कर रहे है फिर वह जिस भी पद ओहदे या परिवार समाज तथा संवैधानिक संस्थाओं में ही क्यों न हों? क्योंकि यह देश हम सबका है और यहां रहने वाले हमारे अपने है फिर ऐसा चारित्रिक, नैतिक पतन क्यों?
जय स्वराज 
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