स्थानीय रोजगार का स्थाई अवसर रोजगार क्रान्ति की नीव रखता मध्यप्रदेश व्यवहारिक धरातल के नजदीक वृक्षारोपण

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स, समाचार एजेन्सी : आखिर नौकरशाहों की जमात में राधेश्याम जुलानिया नाम और नौकरशाहों से जुदा क्यों है? अगर इस प्रमाणिकता का उदाहरण लोगों को देखना है तो लोग म.प्र. की महात्मा गांधी, रोजगार गारन्टी के तहत 2 जुलाई को होने वाले वृक्षारोपण परियोजना को अवश्य देखे। ग्रामीण क्षेत्रों में क्रियान्वियत होने वाली इस परियोजना का वृहत व्यवहारिक पहलू यह है कि इसे धरातल पर लाने स्वीकार्य, उपयोगी एवं समाधान मूलक प्रावधानों को क्रियान्वयन में लिया जाना है। मगर देर से ही सही आजादी के 70 वर्ष बाद वृक्षारोपण के क्षेत्र में जो व्यवहारिक जरुरतों के साथ, लोगों के लाभ का ध्यान रखते हुये जो शुरुआत हुई है वह बड़ी ही व्यवहारिक स्वीकार्य और स्थानीय स्तर पर स्थाई रोजगार का बड़ा कारण साबित होगी। 

महात्मा गांधी रोजगार गारन्टी के तहत म.प्र. में बनी वृक्षारोपण योजना अनुसार अगर इसका क्रियान्वयन पूर्ण निष्ठा ईमानदारी, जबावदेही और कत्र्तव्य निर्वहन के साथ हुआ तो म.प्र. के दूर दराज ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगार, मजदूर, छोटे किसानों सहित पीडि़त वंचित, गांव, गली, गरीब के लिये रोजगार के क्षेत्र में क्रान्ति आनी अवश्यम भावी ही नहीं स्वभाविक है और जिस रोजगार की समस्या को लेकर म.प्र. के मुख्यमंत्री चिन्तित और रोजगार के लिये ग्रामीण हलाकान है उनके लिये यह मात्र रोजगार क्रान्ति ही नहीं, उपादेयता भी साबित होगी। जिससे वह अपना खुशहाल जीवन प्रकृति गोद में आसानी से निर्वहन कर सकेगें और जिसमें आम नागरिक के अपने राज्य, राष्ट्र के प्रति कत्र्तव्य तथा सरकारों के उत्तरदायित्व स्पष्ट नजर आयेगें। 

जरुरत है प्रशासनिक मशीनरी को स्थानीय स्तर पर और अधिक पारदर्शिता और प्रचार-प्रसार के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रो में एक ऐसा माहौल तैयार करने की जिससे सरकार की सबसे छोटी स्थानीय संस्था ग्राम पंचायत, वन, समितियां स्वसहायता समूह, समाजसेवी संस्थायें या छोटे किसान, मजदूर, बेरोजगार अपनी प्रभावी भूमिका इस महा अभियान में निभा पाये। 

धन्यवाद के पात्र है आयुक्त, विकास राधेश्याम जुनानियां जो वृक्षारोपण जैसे महा अभियान को व्यवहारिकता के इतने नजदीक ला धरातल पर लाने अपनी योग्यता का भरपूर प्रदर्शन करने में जुटे है। अगर अनुभव अनुसार जरुरत के मुताबिक केवल संसाधन या मजदूरी का सन्तुलन बना रहा तो निश्चित ही महात्मा गांधी रोजगार गारन्टी आने वाले समय में म.प्र. के लिये बेरोजगारी के क्षेत्र एवं पीडि़त वंचित, किसान, मजदूरों को वरदान साबित होगी। 

मगर यहां भी प्रदेश सरकार की कई माहती कार्यक्रमों की तरह इस योजना में सबसे अहम आवश्यकता सतत समीक्षा, मूल्याकंन एवं समस्या समाधान की। जैसा कि राधेश्याम जुलानियां हर गुरुवार को होने वाली बैठक में किया करते है यह इस बात का प्रमाण है कि परिणाम भले ही तत्कालिक रुप से सौ फीसदी ना मिले। मगर यह अदभुत कोशिश अवश्य सार्थक साबित होगी। मगर इसके लिये एक ओर पहलू अहम है कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी की मानसिकता में बदलाव के साथ कितनी गति आती है इस पर समुचा दारोमदार होगा। 

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