कंटकों से भरे मार्ग से 2018 की तैयार शिवराज के अघोषित शंखनाद से सनाके में सियासतदार

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स, समाचार एजेन्सी 11 जुलाई 2017: 2018 को लेकर जिस तरह के सियासी संग्राम की तैयारी म.प्र. के राजनैतिक मैदान में चल रही है उसे लेकर दोनो ही विपक्षी दलों के बीच खतरा बराबर है। जहां एक ओर कॉग्रेस ने 2018 की अपनी रणनीति स्पष्ट न करते हुये सामूहिक संघर्ष के संकेत सत्ताधारी दल से सत्ता हथियाने लहार में हुये स मेलन के माध्यम से देने का प्रयास किया है। तो दूसरी ओर अपुष्ट खबरों ने सियासी गलियारों में शिवराज की ओर यह साफ कर दिया है कि वह न तो अपने मातृ अनुवांशिक संगठन पर ही निर्भर रहने वाले है और न ही उनके दल के अन्दर सत्ता से उनकी विदाई की मंशा रखने वाले दल व सरकार के अन्दर बैठे उनके सियासी दुश्मनों से डरने वाले है। 

कहते है देर आये, दुरुस्त आये अगर अपुष्ट सूत्रों की खबर सही है तो शिवराज को अपने मानव धर्म और राजधर्म का पालन करने के लिये यह शुरुआत म.प्र. के शिवपुरी के कोटा-नाका स्थित ग्राम में दिये अपने इस व्यान के बाद ही कर देनी थी जिसे लेकर समुचे म.प्र. ही नहीं देश में दल के अन्दर और दल के बाहर सहित सियासी गलियारों और सत्ता में सनाका खिच गया था।  

मगर इतने दिनों तक एक नेक और सच्चा इन्सान जो आत्मा की आवाज पर सत्ता को दरकिनार कर सच बोलने  से भी नहीं हिचका और र्निअपराध होने के बावजूद भी सियासी दंश और कलंक झेलता रहा। अब अगर उसने अपनी आवाज बुलंद की है तो निश्चित ही वह अपने मानवीय धर्म और राजधर्म का पालन करने लगभग तैयार है। मगर जितनी तैयारी के साथ यह अपुष्ट खबर सियासी गलियारों में है उसकी पुष्टि भले ही न हो, मगर इन्सानियत का तकाजा है कि मनुष्य को जीवन में मिलने वाला हर ऐश्वर्य और सुख के पीछे उसके कर्मो का लेखा-जोखा और ईश्वरीय कृपा होती है। ऐसे में कर्तव्य निर्वहन का मार्ग अगर कंटकों से भी भरा हो तो उसका पूरी संवेदनशीलता और सजगता के साथ सामना करना चाहिए न कि विचलित हो कोई ऐसा रास्ता इक्तियार करना चाहिए जो न तो स्वयं व्यक्ति, समाज और राष्ट्र हित में हो। 

वैसे भी किसी भी सत्ताधारी दल या सत्ता प्रमुख को 13 वर्ष का समय बहुत होता है। अगर सत्ता प्रमुख चाहे तो जितने दिनों में बच्चा पैदा होकर एक युवा के रुप में सशक्त ऊर्जा का श्रोत बन जाता है उतने दिनों में तो व्यक्ति ही क्या समाज, प्रदेश, देश का भी काया पलट किया जा सकता है। हो सकता है लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता या सत्ता प्रमुख की अपनी कुछ दलगत या व्यवहारिक मजबूरियां हो जिसका दंश आज शिवराज को भी झेलना पड़ रहा है। मगर लाडली लक्ष्मी, कन्यादान, तीर्थदर्शन एवं मेधावी छात्र एवं डायल 100 जैसी योजनायें रही जिससे गांव, गली, गरीब, वंचित, पीडि़त लोगों को बड़ा लाभ मिला है।

इसे शिवराज सरकार की सामाजिक सेवा भावी सफलता कहे तो दूसरी ओर उनके खाते में स्थाई रोजगार व प्रशासनिक सरलता के क्षेत्र में एक बड़ी असफलता भी रही जिसका मुख्य कारण उनकी दलगत मजबूरी और सत्ता के लिये उनके सलाहकारों द्वारा सुझाये गये सुगम मार्ग जिसके तहत वह बिजली, शुद्ध पेयजल, व्यवहारिक सिस्टेमेटिक सडक़, सिस्टम, कृषि क्षेत्र में अव्यवहारिक योजनायें मंडियों में किसानोंकी लूट, मध्यान भोजन, पोषण आहार में सामूहिक अघोषित लूट का कलंक दल पर कलंक तथा राज्य के लिये मुख्य राजस्व संग्रहण करने वाले विभाग आबकारी, खनिज, परिवहन जैसे अहम विभागों में अधिक राजस्व संघग्रहण के नाम पर विभागीयें मिलीभगत से माफियाओं को खुली छूट जिसने गांव-गांव शराब की दुकानें, मेहखाने सजवाने का काम किया तो वहीं दूसरी ओर खनिज माफियाओं ने प्राकृतिक स पदा की वेतहासा लूट के साथ गांव, गरीब, किसान, पीडि़तों, वंचितों के बीच आतंक फैलाया। 

रहा सवाल परिवहन और पुलिस मेहकमें का तो परिवहन का र्दुभाग्य यह है कि उसने बगैर ड्रायविंग स्कूलों एवं वाहनों को जांचे परखेही ड्रायविंग लायसन्स बांटने की बाढ़ व राजस्व बसूली की आड़ में उस व्यवस्था को आम लोगों के बीच प्रस्तुुत किया जिसके दृश्य सडक़ों पर जलते वाहन उसमें जलते लोग भीषण एक्सीडेन्टों में जान गंवाते लोगों ने यह संदेश स्पष्ट किया कि आखिर उनकी परवाह करने वाला इस म.प्र. में कौन। 

इसी प्रकार अगर हम पुलिस को लेकर बात करें तो एक ओर समुचे प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस बल तो दूर जो स्वीकृत पद भी है उन्हें भी आज तक नहीं भरा जा सका। अपर्याप्त पुलिस बल  के चलते जहां कई मर्तवा प्रदेश के सामने ऐसे दृश्य आये जब पुलिस पर हमला होते देख हमारी सुरक्षा शर्मसार हो गयी। फिर चाहे वह मुरैना आईपीएस का हत्या का मामला हो या फिर कई जगह कुट-पिटकर वापिस लौटते हमारे जवान या भीड़ के आगे हाथ जोडक़र संयम धैर्य रखने की अपील करने वाले हमारे जांबाज अधिकारी। 

विगत वर्षो में पुलिस की ही तरह स्वास्थ मेहकमें का हिसाब रहा जहां स्टाफ की कमी और भ्रष्टाचार से जूझते लोग कलफते नजर आये, न ही सरकार चिकित्सीय स्टाफ बढ़ा सकी, न ही क्षेत्र में भ्रष्टाचार के चलते दवामाफिया राज पर लगाम लगा सकी। परिणाम कि इन क्षेत्रों की व्यवस्थायें शिव सरकार के मंत्री और अधिकारियों के रहते अक्षम और असफल साबित हुई।

मगर इतनी सारी र्दुव्यवस्था के लिये अकेले शिवराज को दोषी करार दिया जाये तो यह एक नेकदिल इन्सान के साथ नइन्साफी होगी क्योंकि किसी भी सरकार और संवैधानिक संस्थाओं में बैठे नौकरशाहों की अपनी सामूहिक जबावदेही होती है। जिसका निर्वहन शायद पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ नहीं हो सका और सरकार इन क्षेत्रों में असफल साबित हुई। 

ऐसा नहीं कि इस बीच शिवराज ने भ्रष्टाचार रोकने या लोगों को सेवा सहूलियते मुहैया कराने कोशिश नहीं की गांव, गली, पीडि़त, वंचितों के नाम सरकारी खजाना लुटाने वाले मु यमंत्री ने प्रदेश भर में मौजूद तंत्र के भ्रष्ट लोगों पर लोकायुक्त, आर्थिक अपराध विभाग के माध्यम से जबरदस्त ऐतिहासिक छापामारी भी कराई जो अनवरत जारी है। मगर तंत्र है जो सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा, न ही सरकार के उनके सहयोगी और कार्यकत्र्ता कई प्रशिक्षण और स मेलनों के बाद यह समझने तैयार कि प्रदेश की जनता ने 3 मर्तवा सत्ता में रहने का मौका गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों की सेवा के लिये दिया है न कि खुद की राजनीति चमका अपने-अपने घर भर लेने के लिये। 

बहरहाल सच जो भी हो काश मानव और राजधर्म की खातिर शिवराज ने प्रदेश भर में फैले ऐसे निस्वार्थ त्याग पुरुष, विद्यवान लोगों की जमात में अपना दखल रख उनसे भी सामूहिक सहयोग की दरकार रख सहयोग लिया होता तो म.प्र. को 15 साल तक रहने वाली सरकार का यह रुप और इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से न जूझना पड़ता। अब यह शिवराज की अपनी रणनीति, राजनीति है या मातृश्री दल की सियासत जो नये रणनीत के साथ और मातृ संगठन सहित संगठन के अन्दर और बाहर दुश्मनों के जमावड़े की अपुष्ट खबरें आ रही है।   
जय स्वराज
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