अहम, अहंकार से सहमा आग्रह और अन्नदाता: भोपाल में सिंधिया का सत्याग्रह

व्हीएस भुल्ले। यूंं तो लोकतंत्र में आग्रह का मु य आधार सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक, आर्थिक पतन से मुक्ति का मार्ग हो सकता है जिसके लिये मंत्रणा प्रयास आपसी सहयोग, एकता सहमति, असहमति धरना, प्रदर्शन, अनशन, सत्याग्रह इत्यादि तरीके अपनाए जा सकते हैं। मगर, फिलहाल मसला अन्नदाताओं को लेकर है जहां सत्य के लिये आग्रह और अहम, अहंकार के बीच जंग छिड़ी है और अन्नदाता स्वयं को ठगा-सा मेहसूस कर सहमा हुआ है।

ज्ञात हो कुछ ही दिन पूर्व अपनी जायज मांगों को लेकर संगीनों के आगे अपनी शहादत देने वाले हमारे किसानो की अभी तो राख भी ठंडी नहीं हुई और उस पर से सत्य के लिए आग्रह और सियासी सवालों के बीच संग्राम छिड़ गया है। सत्याग्रह को लेकर सत्ता पक्ष की ओर से सत्याग्रही के खिलाफ व्यक्तिगत बयानबाजी अन्नदाताओं के सहमे होने का मु य कारण है।

ये अलग बात है कि हमेशा से अन्नदाताओं की बात करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार फिर से अन्नदाताओं की खातिर भोपाल की भूमि पर 72 घन्टे के लिये सत्याग्रह पर है। देखना होगा कि सिंधिया का अन्नदाताओं की खातिर सत्य के लिये आग्रह सरकार पर कितना असर छोड़ पाता है। हालाकि सिधिया व सत्ता के बीच सीधी छिड़ चुकी जंग में किसे सफलता हासिल होती है यह तो भविष्य की बात है। फिलहाल जहां सिंधिया के सत्याग्रह के साथ समुचि कांग्रेस खड़ी है वहीं सरकार के साथ भाजपा।

सत्य के आग्रह पर सत्ता और संगठन के सियासी सवाल 
सत्य के लिये आग्रह कि पर परा अनादिकाल से भारत में रही है। हमारे पवित्र ग्रंथ रामायाण से लेकर गीता तक में सत्य के आग्रह का उल्लेख है। गुलाम भारत से लेकर आजाद भारत तक सत्य के लिये किए गए आग्रह और संघर्ष का परिणाम देश वासियों के सामने आजाद देश है। मगर, सत्ता द्वारा आज सत्य की अनदेखी कर, सत्याग्रह पर सियासी सवाल दागना लोगों की समझ से परे है और अपशगुन भी। खासकर उन स्वार्थवत सत्ताओं के लिये जो स्वयं को समय का शासक मान सतत सत्ता में बने रहने की भूल रावण की तरह करना चाहती हैं। जिसके लिये वह न तो हमारे पवित्र धर्म ग्रन्थ रामायाण, गीता से कोई संदेश या सीख लेना चाहते है न ही सत्य के लिये सत्याग्रह और पीडि़त वंचितों की चीख पुकार सुनना चाहते है, न ही लोकतंात्रिक व्यवस्था के उस तकाजे या सिस्टम को समझना चाहते है जिस पर समुचा लोकतंत्र और राष्ट्र टिका है। 

बहरहाल जो भी हो कभी अन्नदाता के नाम से वि यात राज परिवार के मुखिया का आजाद भारत में कहे जाने वाले अन्नदाताओं की खातिर भीषण गर्मी की बीच सत्य के लिये आग्रह करने पर उसके खिलाफ सत्ता व संगठन के द्वारा सियासी सवाल और वह भी बेहद व्यक्तिगत समुचि नैतिकता और राजनैतिक परंपराओं को चिड़ाते नजर आते है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय को आंखे दिखाना और सत्य की अनदेखी ही सत्ता की सबसे बड़ी विड बना है। आन्दोलित प्रदेश में फिलहाल जिस तरह से सत्याग्रह को लेकर सत्ता व उस संगठन के  नेताओं द्वारा सियासी सवाल खड़े किये जा रहे है। वह उस महान संगठन और उस महान लोकतंत्र को शर्मसार करने काफी हैं। जिसका लोहा देश ही नहीं समुचा विश्व मानता है। 

अब इसे सत्ताधारी का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य जो उसके नेता सत्य के खिलाफ अनर्गल अहंकारी व्यानबाजी कर रहे है। जिससे एक प्रतिष्ठित सरकार ही नहीं संगठन की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि जिस तरह से जीवन के सत्य को नहीं भुलाया जा सकता। उसी तरह सत्य के लिये आग्रह अर्थात सत्याग्रह के सत्य को नहीं झुठलाया जा सकता। 

फिलहाल जो लोग आज तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को न समझ सके उनसे गांधी के सत्याग्रह को समझने की उ मीद करना इस महान लोकतंत्र में बेमानी सा लगता है।
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