दर्द से मुक्ति का मार्ग खोजता देश

व्ही.एस.भुल्ले। देश का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं कि कौन क्या कह और कर रहा है, देश का दर्द तो यह है कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी पीडि़त वंचितो...

व्ही.एस.भुल्ले। देश का दर्द सिर्फ इतना ही नहीं कि कौन क्या कह और कर रहा है, देश का दर्द तो यह है कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी पीडि़त वंचितों का कारवां लाख मशक्कत के बाद भी क्यों बढ़ रहा है? क्यों सत्ता संचालित करने वाले दल वैचारिक आधार पर अलग-अगल होने के बावजूद देश व देश की पीडि़त वंचित मानवता की सेवा, उसके कल्याण के नाम एक नहीं हो रहा है? क्यों पक्ष-विपक्ष सदनों, विधानमण्डलों में एक साथ बैठने के बावजूद राष्ट्र, जनहित में सार्थक संवाद करने तैयार नहीं? क्यों हमारे ही अपने संवैधानिक संस्थाओं में बैठ अपने ही लोगों की सेवा करने तैयार नहीं? दायित्व विहीन होती हमारी संस्थायें, कत्र्तव्य विहीन होते जि मेदार लोग आखिर कैसा राष्ट्र और किसका कल्याण कैसे करना चाहते है? अहम मुद्दों पर सदनों से बाहर सडक़ों पर लगने वाली चौपाल और टी.व्ही. डिवेटों में होने वाली चर्चायें क्या संदेश देना चाहती है, इस देश को, यह तो वह जि मेदार लोग ही जाने। 

          मगर दुर्भाग्य देश की, करोड़ों करोड़ जनता का, कि वह हर 5 वर्ष में स्वीकार्य संविधान की व्यवस्था अनुरुप अपने जनप्रतिनिधि चुनती है। जो सदनों में बहुमत के आधार पर सरकारें चुनते है और फिर चुनी हुई सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली नीतियों, कानून, जनकल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन और सुरक्षा हेतु साधन स पन्न संस्थायें व प्रतिशिक्षित पढ़े लिखे लोग उनका क्रियान्वयन करते है। जिनके प्रति देश के आम लोगों की ही नहीं, पीडि़त वंचित मानवता की भी गहरी आस्था होती है, जिसके लिये वह 5 पांच वर्ष में वोट तो विभिन्न अनौपचारिक करो या सीधे कर के रुप में सरकार व व्यवस्था चलाने संसाधन के रुप में नोट भी देते है। 

             मगर सारी कोशिसों मशक्कतें करने के बावजूद भी देश का दर्द घटने के बजाये बढ़ता ही जा रहा है। अगर यो कहे कि बढ़ती कत्र्तव्यहीनता, उत्तरदायित्व विहीनता, स्वार्थ, भ्रष्टाचार  के चलते देश दशहत में है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। फिर क्षेत्र जो भी हो, चाहे वह बढ़ती जनसं या का दबाव, बेरोजगारी, शिक्षा, सुरक्षा, संस्कृति, संस्कार, कृषि, स्वास्थ, परिवहन, जल, जंगल, जमीन व देश में मौजूद नक्सल, आतंकवाद जैसी समस्यायें हो। 

           ऐसा नहीं कि आजादी के बाद से आज तक कुछ भी नहीं हुआ सच तो यह है कि देश में आजादी के बाद बहुत कुछ हुआ। सड़ी ज्चार, बाजरा, जौ तक और स्लेट बत्ती से लेकर पर्याप्त खादन्न उत्पादन और क प्यूटर तक हम आ पहुंचे है। मगर विगत 30 वर्षो में राष्ट्र का जो नुकसान हुआ है वह किसी से छिना नहीं। मगर राष्ट्र व जनसेवा को लेकर आज जिस तरह की व्यानबाजी, आरोप, प्रत्यारोपों की तलवारें सियासी दलो के बीच खिची रहती है। वह देश के दर्द को बढ़ाती ही नहीं, बल्कि पीडि़त वंचित मानवता को भी, डराती है। 

        आखिर देश के महान सियासी दल इतनी सी बात क्यों समझने तैयार नहीं कि सत्ताधारी दल को 5 वर्ष तक देश व जनसेवा का संवैधानिक हक हासिल होता है। वहीं विपक्ष को उसके संवैधानिक हकों के अनुकूल सकारात्मक रचनात्मक विरोध करने का। जिसका आधार अगर सरकार कुछ अच्छा करेगी तो पुन: सत्ता में बैठेगी, अगर कुछ गलत करेगी तो सत्ता से स्वत: ही जनता उसे बाहर कर देगी, इतिहास गवाह है। पूर्व में भी बड़ी-बड़ी ताकतबर लोकप्रिय सत्तायें रही है और धरासायी भी हुई है और आधार विहीन दलों की सरकारें भी बनी और चली है। 

        आखिर हम या हमारे दल उनके नेता सत्तायें नौकरशाह, शिक्षाविद, उघोगपति, व्यापारी जरा सी बात क्यों भूल जाते है कि सभी को जीवन पर्यन्त इसी महान भू- ााग पर मिल-जुलकर रहना है। न तो यह भू- ााग बढ़ेगा, न ही जल और न ही बढ़ती जनसं या ही घटने वाली है। ये अलग बात है कि हमारे पास मौजूद भौतिक, आर्थिक संसाधनों में असमानता हो सकती है, मगर शुद्ध वायु, जल, जंगल, जमीन और सुरक्षा की आवश्यकता सभी को होगी। 

          अगर इसी तरह कत्र्तव्यहीनता, उत्तरदायित्व विहीनता, भ्रष्टाचार, असुरक्षा का भाव और लोगों में अविश्वास बढ़ता गया और व्यवस्थायें चौपट होती रही। तो आने वाले समय में ऐसी कत्र्तव्य विहीन, उत्तरदायित्व विहीन संस्थायें और भ्रष्टाचार, स्वार्थ में लिप्त वह लोग भी इस देश में संघर्षरत पीडि़त वंचितों की भांति, संघर्ष मुक्त नहीं रह पायेगेंं। तब देश का दर्द मुक्ति पाने में पूर्ण रुप से अक्षम और असफल साबित होगा। 

           बेहतर हो कि समय रहते, हम अपने स्वार्थ, अहंम, अहंकार आपसी द्वेष प्रतिशोधों को भूल, पूरी निष्ठा ईमानदारी से राष्ट्र व जनसेवा में जुटे। वहीं सरकार का विपक्ष को सकारात्मक संरक्षण तो विपक्ष का सरकार को सकारात्मक मुद्दों पर सहयोग करना चाहिए। वहीं शिक्षाविद, विद्ववानों सहित नौकरशाहों को पूरी निष्ठा ईमानदारी से अपना-अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर, श्रेष्ठ दिव्य और भव्य भारत निर्माण की दिशा में कार्य करना चाहिए जिससे पीडि़त वंचितों का कल्याण सुनिश्चित हो और देश स पन्न, खुशहाल बनने की दिशा में आगे बढ़ सके। 
जय स्वराज

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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दर्द से मुक्ति का मार्ग खोजता देश
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