देश के सर्वोच्च पद पर देश की सहमति बहुमत की मुहर होगी, आधार

विलेज टाइम्स, व्ही.एस.भुल्ले: देश में लोकतांत्रिक पर पराओं को मजबूती प्रदान करती देश की राजनीति ने साबित कर दिया कि देश में लोकतंत्र कमजोर होने के बजाये और मजबूत होने की ओर बढ़ रहा है। जिस तरह देश के वंचित, पीडि़त वर्ग विशेष से राष्ट्र के सर्वोच्च पद के लिये देश की सहमति बनी है। वह ऐतिहासिक ही नहीं भारत की मजबूत महान संस्कृति परंपराओं को भी रेखांकित करती है। फिर नाम कोई जो भी हो, मगर जिस तरह से देश सर्वोच्च पद के लिये लोकतांत्रिक पर पराओं का पालन करते हुये समुचे देश की देश के सर्वोच्च पद के लिये सहमति बनी है, वह देश ही नहीं हमारे महान लोकतंत्र और भारतीय पर परा संस्कृति के लिये शुभ संकेत है।

ये अलग बात है कि लोकतंत्र में सर्वसहमति का अपना सम्मानजनक स्थान होता है मगर लोकतंत्र को जिन्दा रखने और उसे मजबूत बनाने लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन भी आवश्यक होता है। जिसका आधार लोकतंत्र में बहुमत होता है और आज समुचे देश ने अनुसूचित जाति से देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के लिये जो सहमति दी है वह हमारे महान राष्ट्र की संस्कृति परंपरा की महानता की प्रमाणिकता है। 

निर्वाचन पश्चात बहुमत के आधर पर नाम देश के सामने जो भी आये, मगर वर्षो से पीडि़त वंचित वर्ग के लिये देश के सर्वस मति से जो स मान मिला है वह देश के लिये सौभाग्य की बात है। जहां देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करने महिला पुरुष दोनो वर्गो से अनुसूचित जाति वर्ग के सर्वोच्च पद के लिये प्रत्याशी मैदान में है जो राजनैतिक तौर पर सत्ताधारी दल व विपक्षी दलों के प्रस्तावित प्रत्याशी कहे जा सकते है। मगर इतना तय है कि देश के सर्वोच्च पद से देश का नेतृत्व अब अनुसूचित जाति के मजबूत हाथों से होने वाला है जो राष्ट्र को मजबूती प्रदान के साथ ही राष्ट्र को स पन्न खुशहाल बनाने वाला होगा।  

ज्ञात हो कि सत्ताधारी दल भाजपा नेतृत्व वाले गठबन्धन रा.ज.ग. ने जहां रामनाथ कोविंद का नाम देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के लिये प्रस्तावित किया है वहीं विपक्ष की भूमिका निभाने वाले गठबन्धन यूपीए ने कॉग्रेस के नेतृत्व ने मीरा कुमार पर अपनी सहमति दर्ज की है। जो दोनो ही अनुसूचित जाति से आते है अर्थात भावी राष्ट्रपति देश का अब अनुसूचित जाति से होगा जो देश के लिये शुभ संकेत है और सेकड़ों वर्षो से पीडि़त, वंचित वर्ग के लिये सर्वोच्च सम्मान की बात। 
जय स्वराज
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