मिसाल बना म.प्र., सियासी संघर्ष में डूबे अहम सवाल

विलेज टाइम्स : अब इसे म.प्र. की करोड़ों करोड़ जनता का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य, कि विगत 11 वर्षो में म.प्र. में शुरु हुये पीडि़त, वंचित मानवता की सेवा के लिये कई जनकल्याणकारी कार्य या तो चर्चा का विषय बने या फिर मिसाल बन गये। मगर इस बीच कुछ अहम सवाल सियासी संघर्ष के चलते काफी पीछे छूट गये। फिर चाहे वह आम नागरिक व पीडि़त मानवता की संपन्नता खुशहाली को लेकर रहे हो, या फिर रोजगार के लिये भटकती पीडि़त मानवता और बेरोजगार युवाओं को लेकर, जिसका परिणाम कि बगैर डिटेल, डीपीआर के शुरु हुआ म.प्र. का अघोषित प्रोजेक्ट ऑफ गिलान्स तब चारों खाने चित नजर आया जब 11 वर्ष की सत्ता का मूल्यांकन और जनआकांक्षाओं के बीच विरोधावास नजर आया। विपक्ष विहीन प्रदेश में जनकल्याण से जुड़े कई कार्यो में तो बड़े-बड़े झंडे गाड़े गये। मगर अधोरसंरचना निर्माण से लेकर रोजगार तक के सारे प्रयास धरासायी नजर आये। 

अगर हम बात म.प्र. की 11 वर्ष पुरानी सरकार की करे तो सत्ता के सहज मुखिया के 8 वर्ष तो सियासी संघर्ष को विराम देते या सियासी सूरमाओं से संघर्ष करते ही गुजर गये। शेष रहे 3 वर्ष तो अपनो के बीच समस्या ग्रस्त मुखिया के अहम मंसूबे वक्त की मार के चलते सिसकते नजर आये। अगर यो कहे कि सत्ता के मुखिया ने म.प्र. की बागडोर समझलते ही भय, भूख, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संकल्प ले, खासी शुरुआत की, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। मगर सियासी मजबूरियों ने उन्हें कभी फलीभूत नहीं होने दिया। कोटा नाका में व्यक्त सत्ता के मुखिया की पीड़ा जो उन्होंने सियासी षडय़ंत्रों के चलते एक नेक दिल इन्सान के नाते, जब बेबाक व्यक्त की तो म.प्र. की राजनीति में सनाका सा खींच दिया था। मगर संस्कार और दल गत सियासी उठापटक के बीच सत्ता के मुखिया को इस सबके बावजूद भी कई मर्तवा विपक्ष के विभिन्न आरोप प्रत्यारोपों से भी दो चार होना पड़ा। हालात ये बने कि सियासी गन्दगी ने उनके परिवारजनो को भी सियासी दांव पेंच में खींच लिया। 

मगर समय के साथ अपना राजनैतिक कौशल दिखाते हुये सत्ता के मुखिया ने हार नहीं मानी और रार भी नहीं ठानी तथा तीसरी मर्तवा सत्ता में आते ही वंचित पीडि़त मानवता की सेवा का अभियान जारी रखा। मगर सियासी संघर्ष ने इस बीच कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। मानो कि सत्ता प्रमुख और संघर्ष का चोलीदामन का साथ रहा हो। सबसे अहम बात तो इस दौरान यह रही कि केन्द्र से अनुकूल आर्थिक मदद न मिलने के बावजूद भी पीडि़त वंचित मानवता की सेवा के जुनून के आगे शायद अधोसंरचना निर्माण और रोजगार जैसे अहम सवाल छूट गये। जिसका जबाव स्वभाविक रुप से 2018 में म.प्र. के मुखिया को देना होगा। 

क्योंकि यह भी सच है कि भय से निवटने 100 डायल, भूख से निवटने अन्तोदय, राशन, रसोई और भ्रष्टाचार से निवटने ईट्रेटंरिंग सहित कई बदलाव और आर्थिक अपराध ब्यूरो, लोक आयुक्त की निरन्तर कार्यवाहियों से यह साफ है कि मुखिया की मंशा कड़े संघर्ष के दौरान भी वंचित पीडि़त मानवता की सेवा और भारतीय संस्कार, संस्कृति को प्रोत्सहित करने वाली रही। जिसके दो प्रमुख उदाहरण उज्जैन का महाकुंभ और नर्मदा यात्रा रही। मगर यक्ष सवाल आज भी अनुत्तरित है। अगर स यता, संस्कति, संस्कार और स्थापित संस्थाओं के सिद्धान्तों की माने तो हमारे जीवन मूल स पन्न एवं खुशहाल जीवन के पैरोकार रहे है। 

जिनकी पूर्ति न तो सरकार और न ही सत्ता प्रमुख करने में संघर्षो के चलते सफल और सक्षम साबित हो सके। रहा सवाल शेष बचे 1 वर्ष का तो अगर सियासी संस्थागत मातृ संगठन की सेवा में समर्पित सत्ता प्रमुख का आलम पीडि़त वंचित मानवता की सेवा सहित उसके संपन्न खुशहाल जीवन का पैमाना यहीं रहा तो कोई कारण नहीं कि बगैर किसी अपराध के इतिहास सत्ता प्रमुख के तमाम संघर्षो के बावजूद सियासी दोषी करार देने में संकोच न करे। जो सियासत में रहते एक जनसेवक के लिये दंड होगा या पुरुस्कार यह तो 2018 में होने वाले आम विधानसभा चुनावों में तय हो सकेगा। 
जय स्वराज
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