ग्लोबल माहौल में महापुरुषों का माखौल, खतरनाक

व्ही.एस.भुल्ले। हमें नहीं लगता जिस संस्था, संगठन के संस्कार, संस्कृति के सहारे जो लोग इतने ऊंचे-ऊंचे पदो पर सरकार व संगठनों में पहुंचते है। वहां भी अपने देश की महान विभूतियों का माखौल उड़ाना सिखाया जाता हो। मगर लोकतंत्र में नीतिगत विरोध का अपना तरीका होता है। जिसमें इतिहास और तथ्य सहित स य, सालीन, भाषा का उपयोग स्वीकार रहा है, मगर निम्र स्तरीय टीका-टिप्पणी खासकर ऐसे लोगों के खिलाफ जिन्होंने राष्ट्र व समाज के कल्याण में माहती योगदान दिया हो, उनके खिलाफ इस तरह की टीका-टिप्पणी की न तो हमारी संस्कृति रही, न ही कभी संस्कार रहा। ये सच है कि आजादी से पूर्व और आजादी के बाद कई महापुरुषों ने वैचारिक तौर पर त्याग-तपस्या के बल, अपने सार्थक तरीके से ऐसी ताकतों का विरोध व संघर्ष किया और जरुरत पडऩे पर कुर्बानियां भी दी, जिन्होंने पीडि़त, वंचित मानवता के साथ अन्याय, अत्याचार किया। 

ये अलग बात है कि देश की मौजूद पीढ़ी, कुछ महापुरुषों का इतिहास जानती हो, तो कुछ से अनभिज्ञ हो।   अगर सरकार या संगठनों के प्रमुख ही अपने राष्ट्र भक्तों, महापुरुषों पर छडिक़ तालियों या राजनैतिक स्वार्थ बस इस तरह से हल्की टीका टिप्पणियां करेगें तो देश में बढ़ते अविश्वास पूर्ण माहौल को और बढ़ते देर नहीं होगी और ऐसी स्थिति में  अविश्चास को और अधिक बल मिलेगा, जिसे रोकना हर नागरिक का कत्र्तव्य है। इसीलिये भाषा, बोली का अपना एक स्तर होना चाहिए, जो लोग गांधी या गांधी के विचार या उनकी भावना व देश के लिये उनकी त्याग तपस्या कुर्बानी को नहीं समझते, उनसे निवेदन होना चाहिए कि वे न तो गांधी को पढ़े और न ही समझने की कोशिस करे। क्योंकि जिस गांधी नाम को समुचा विश्च, जीवंत मानवता, स य समाज लोकतंात्रिक व्यवस्था में सार्थक मानते हो और उनके प्रति स मान का भाव र ाते हो। ऐसे गांधी जी को लेकर नि न स्तरीय टीका-टिप्पणी न हो, तो बेहतर होगा। क्योंकि अगर इस महान देश में सत्तावत स्वार्थो के चलते नये-नये इतिहास, संस्कृति, पर परायें गढऩे या गढ़े मुर्दे उखाडऩे का दौर शुरु हुआ तो यह हमारे महान राष्ट्र और न ही इस राष्ट्र के नागरिकों के हित में होगा।  

क्योंकि किसी भी राष्ट्र में जन्मे महापुरुष न तो किसी विशेष पार्टी, संगठन के व्यक्तिगत होते है, वे तो समुचे राष्ट्र के लिये पूज्यनीय और राष्ट्र की धरोहर होते है। फिर उनके विचार राष्ट्र व जनकल्याण के लिये जो भी रहे हो, उनके नाम पर कोई भी दल, संगठन चलते हो। यहां समझने वाली बात यह है और अपने ही महापुरुषों पर टीका-टिप्पणी करने वालो के लिये खासकर एक उदाहरण बतौर जैसा कि देश का एक अनूठा क्षेत्र जो मध्य भाग से वास्ता र ाता है जिसे भिण्ड, मुरैना या ग्वालियर-च बल के नाम से जाना जाता है। उस क्षेत्र के लोगों से सीखना चाहिए कि जहां सेकड़ों वर्षो खून का बदला, खून का नारा आबाद रहा हो, मगर अब वह खतरनाक नारा गांधीवादी तरीके और विनोवा जी की मेहनत का परिणाम है व सतत समुचा जीवन विश्व की भलाई में समर्पण करने वाले सुब्बाराव जी का परिश्रम रहा। कि कभी बागी, तो क ाी दस्युओं के नाम से समुचे देश को थर्राने वाला ग्वालियर-च बल अब शान्ति के मार्ग पर अग्रसर हो अब विकास पथ पर अग्रसर है। जहां से देश के प्रधानमंत्री अटल जी भी रहे है और केन्द्र की सरकार में नरेन्द्र सिंह तोमर भी है। 

अगर महात्मा गांधी को जो भी लोग जानना चाहते है या गांधी नाम से अनभिज्ञ है तो वह सबसे पहले गांधी जी की त्याग तपस्या और उनकी वंचित पीडि़त जनता से समानता बैठाने का गुर जाने। जो उन्होंने भारत लौटते ही वंचित पीडि़तों की हालात देख, अपनाया था और अपना सूट-बूट फैक, देश के लोगों की तरह लगोंटी लगा, खुले बदन समुचे जीवन पीडि़त वंचितों की आजादी के लिये फिरंगियों से निढाल हो, संघर्ष किया। क्योंकि गुलामी के वक्त देश के पीडि़त वंचितों के पास एक से दूसरा वस्त्र नहीं होता था। 

दूसरा आन्दोलित लोगों के साथ सत्य के लिये संघर्ष के सटीक माध्यमों से विरोध दर्ज कराने का तरीका। तब तो अंग्रेज थे अब तो अंग्रेज नहीं। कम से कम ऐसे लोग अपने ही देश की पुलिस के आगे निहत्थे खड़े रह, विरोध करके तो देखे कि गांधी क्या थे और तब महापुरुषों पर टीका-टिप्पणी कर, उनका माखौल उड़ाये। बेहतर हो कि सत्ता या स्वयं की छवि चमकाने, कभी भगवान, तो कभी राष्ट्र, तो कभी सैनिक, तो कभी महापुरुषों को आगे कर, टीका टिप्पणी कर माखौल उड़ाने का क्रम इस महान देश में बन्द हो। 

बरना नव गठित संस्कृति, संस्कार, पर परायें आने वाले समय में ऐसे लोगा ही नहीं, समुचे मानव जगत पर इतनी  भारी पढऩे वाली है जिसकी कल्पना किसी ने सपने में भी न की होगी। तब न तो हमारे पास हमारे महापुरुषों की दुहाई होगी और न ही वह संस्कृति और संस्कार जिनके बल पर हम अपने वंचित पीडि़तों में वेबजह पनपते अविश्चास और आक्रोश को रोक पाये, फिर न तो दल, संगठन, संस्थाओं की माहती भूमिका रह जायेगी और न ही मौजूद व्यवस्था का औचित। 
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