क्या दमन से दहला प्रदेश ? अहम, अंहकार, आंकड़ों, अधिकारियों से घिरी सरकार, हुई शर्मसार

व्ही.एस.भुल्ले, अन्नदाताओं को न्याय नाम चले हिंसक आन्दोलन का परिणाम है कि 5 अन्नदाताओं की मौत और कई वाहन शासकीय प्रायवेट संपत्तियों जलकर खाक हो गयी। अब इस घटना क्रम के लिये दोषी जो भी साबित हो, मगर प्रथम दृष्टया देखा जाये तो कई मोर्चो पर जनसेवा जुटी सरकार से बड़ी भूल हुई है। जिसे वह अहम अहंकार, आंकड़ों और अधिकारियों से घिरे रहने के चलते महसूस नहीं कर सकी और धीरे-धीरे वह अपने के ही जाल उलझ आज शर्मसार हो गई।

अगर यो कहे कि सत्ता शासन का अपना एक धर्म होता है जिसे राजधर्म कहते है मगर सतत सत्ता में बने रहने और पीडि़त वंचितों की सेवा के जुनून ने उसे इस हद तक अंधा कर दिया कि उसे यह ऐहसास ही नहीं हो सका कि प्रदेश का अन्नदाता, पीडि़त वंचित रह किस हद तक व्यवस्था से पीडि़त है। किस तरह वह आय दिन अपनी भावनाओं का दमन होते देख देखता है। काश राजधर्म का पालन हुआ होता तो सरकार को यह दिन नहीं देखना पड़ता। अगर हम अपुष्ट सूत्र और विगत 11 वर्ष के घटनाक्रमों सहित सरकार की वर्तमान दलीलों और आन्दोलन के बीच घटे घटनाक्रमों की समीक्षा करे तो बहुत कुछ समझ मेे आ सकता है। 

आम जनता ही नहीं, हमारे अन्नदाता, पीडि़त, वंचितों के बीच आक्रोश का पहला व्यवहारिक कारण यह हो सकता है कि वह विगत 11 वर्षो से अपना खून, पसीना एक कर, पीड़ी दर पीड़ी दिन रात मेहनत करते आ रहे है। मगर वह तो आज भी वहीं के वहीं अभावों के बीच खड़े है व उनके बच्चे भी आज आभाव ग्रस्त, शिक्षक ग्रस्त स्कूलों में पढ़ रहे। मगर कल जो झण्डा लिये घूमते थे वह लखपति, करोड़पति बन, उनके सामने ही लग्जरी गाडिय़ों में फर्राटे भर रहे है। और उनके बच्चे अब किसी सरकारी स्कूल में नहीं, मंहगे-मंहगे प्रायवेट स्कूलों में पढ़ रहे है और हमें हमारे मेहनत के दाम तक नहीं मिल रहे है, जैसी कि आक्रोश को लेकर आम चर्चा है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण बगैर सुने, समझे पीडि़तों से सीधा संवाद किये बगैर, सियासी व सत्तात्मक रुप से जनभावना या अभिव्यक्ति का दमन, चाहे वह कर्मचारी, अधिकारियों का आन्दोलन हो या फिर चुने हुये जनप्रतिनिधियों का आन्दोलन। यहां तक कि अभिव्यक्ति के लिये लोकतंत्र में मौजूद एक माध्यम मीडिया होती है जिसे इस हद तक प्रभावित किया गया कि उसने भी पीडि़त वंचितों की अनदेखी करना शुरु कर दी और जनाआक्रोश पिघलने के बजाये बढ़ता ही गया।

तीसरा कारण दल के नेता, कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर, जनधन से विभिन्न योजनाओं के शुभारंभ सम्मेलन पंचायतों अधिकारी कर्मचारियों के अघोषित सहयोग से हुये भव्य-दिव्य कार्यक्रमों का स्वयं की पीठ थप-थपाना भी हो सकता है। 

चौथा कारण सेवा सुविधा के नाम क पनियों का गठन, सेवा प्रदाता क पनियों के नाम लोगों को मानसिक प्रताडऩा के साथ लोगों का मजबूरी में लुटना व अपमानित होना भी हो सकता है। 

पांचवा मुख्य कारण शान्ति पूर्ण जन आन्दोलनों को कुचलने अपने सहयोगी संगठनों व सत्ता की मदद से मीडिया मैनेज कर उन्हें निस्तानाबूत करते रहना भी लोगों में आक्रोश जगाने का कारण हो सकता है।  

छटवां कारण सबसे बड़ा कि प्रदेश में रोजगार तो बड़े नहीं, अब्बल जिला तहसील स्तर पर होने वाले छोटे-मोटे ठेकेदारी, स्थानीय उत्पादन सप्लाई से जुड़े रोजगारों का अघोषित केन्द्रीयकरण के चलते खत्म हो जाना भी एक कारण हो सकता है। कारण तो और भी हो सकता है मगर समझने की फुरसत तो हो सरकार के पास। सतत सत्ता के लिये व्यस्त रहने वाली सरकार यह भी भूल गई कि अधोसरंचना निर्माण के साथ रोजगार भी अहम मुद्दा है। सरकार और शासकीय संस्थाओं की विश्वसनीयता आम नागरिक में बनी रहेगीं, किसी भी सत्ता के लिये सबसे बड़ा मसला है।  

यह वे अहम सवाल है जो देखे सुने महसूस किया जा सकते है अध्यात्म हो या विज्ञान, प्रकृति हो या फिर विचारों का प्रवाह सभी के लिये सुगम मार्ग की आवश्यकता होती है। अगर सरकार की किसी रीति या नीति से प्रकृति, विज्ञान के मार्ग अवरुद्ध होते है तो उसके परिणाम भी घातक होते है। जिस तरह से प्राकृतिक  सिद्धान्त विसार सरकार अपने जनसेवा के अहम, आंकड़े और अधिकारियों से घिरी रही। और अपने ही जाल में उलझ वह आज मुकाम पर जा पहुंची जिसे सदियो तक एक सत्ता की गलती को लोग याद रखेगें। इससे हास्पद शर्मनाक बात किसी सरकार के लिये और क्या हो सकती है। कि अन्नदाताओं को भडक़ाया जा रहा किसी भी सत्ता सरकार का इससे अधिक शर्मनाक गैर जिम्मेदारना बयान इससे हटके और कोई हो नहीं सकता। सत्ता की इतनी बड़ी मशीनरी एसबी सीआईडी, सीबीआई पुलिस है जिसमें से कुछ एजेन्सी तो रोजाना सरकार को रिपोर्ट करती है फिर सरकार क्यों नहीं भांप सकी कि अन्नदाताओं को भडक़ाया जा रहा है।

बहरहाल अभी भी बहुत कुछ  बिगड़ा नहीं, सरकार चाहे तो अभी भी अपने राजधर्म का पालन कर इस कलंक की भरपाई तो नहीं तो नहीं कर सकती मगर पीडि़त वंचित अन्नदाताओं का दर्द अवश्य कम कर अपने राजधर्म का पालन कर सकती है। काश सरकार ने विलेज टाइम्स की खबरों पर संज्ञान लिया होता या आलेखों को पढ़ा होता, तो सरकार को पूर्व में ही जनभावना समझने में देर न होती। क्योंकि विलेज टाइम्स स्वराज के माध्यम से खुशहाल जीवन और पीडि़त वंचितों की बात करता रहा है।
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