सिंधिया को शिकस्त देने, शिवपुरी में षडय़ंत्र पूर्ण सियासत, सेवा सुविधाओं को लेकर शहर में मचा कोहराम

विलेज टाइम्स समाचार एजेन्सी: म.प्र. शिवपुरी- अगर कलयुग नाम की कोई चीज होती है तो लोगों को शिवपुरी का भ्रमण अवश्य करना चाहिए क्योंकि इस ऐतिहासिक शहर में सिंधिया नाम को शिकस्त देने सियासी षडय़ंत्रों का सैलाब जो टूट पड़ा है। बात नैसर्गिक सुविधायें, चिकित्सा, पेयजल, बिजली की हो या फिर मुंह मांगे दाम चुकाने के बाद न मिलने वाली सेवा सुविधाओं की हो। कहीं टेक्स तो कहीं अनापसनाप बिलो के माध्यम से सरेयाम सेवा प्रदाता क पनियों व संस्थाओं द्वारा सेवा सुविधाओं के नाम पीडि़त वंचित मानवता से खुलेयाम लूट, अपमान किया जाता है। मानों अब इस शहर में इस तरह की संस्कृति पर परा बन गई हो। चहुंओर पीडि़त वंचित लोग आज धन, धन्धों की लूट तथा अहम अहंकार के आगे कलफते नजर आते है, मजबूर है वो लोग जो शहर छोडक़र पलायन नहीं कर सकते। न ही वह ऐसे खानाबदोस है, जो पल भर में पीडि़ओं का घर छोड़ और कहीं रह सकतेे।  

मगर र्दुभाग्य इस शहर का कि क्या सत्ता क्या शासन और जनसेवक कोई भी पीडि़त वंचितों की डकार सुननेे तैयार नहीं। बेचारी मानवता सरेयाम रोजाना कलफती है। मगर हमारी संवैधानिक संस्थायें और इनके संरक्षकों को शर्म आना तो दूर उन्हें सिकन तक महसूस नहीं होती। क्या जनसेवा, जनकल्याण में जुटी सत्ता, संस्थाओं का यह धर्म नहीं कि जिस जनसेवा, राष्ट्र, जनकल्याण के लिये वह ईश्वर की शपथ ले, संविधान व विधि अनुसार जनसेवक होने के नाते सभी के साथ समान व्यवहार, न्याय और सेवा करने की शपथ लेते है आज वहीं शासक सेवक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के बजाये पीडि़त वंचित मानवता को आंखे दिखा, उन्हें खून के आंसू रोने पर मजबूर करते है। 

काश पीडि़त वंचित मानवता की पीड़ा मापने उसका अपना कोई पैमाना होता, तो आज उसे विश्वासघात के बदले यह दिन नहीं देखना पड़ता। जहां उसे नैसर्गिक जरुरतों की पूरी कीमत चुकाने के बावजूद भी ठीक से सेवा सुविधा मयस्सर नहीं और जिनकी उ मीद है वह भी सियासी षडय़ंत्रों का शिकार हो, हलक में अटकी पड़ी है। अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो सारा किया धरा उस सियासी षडय़ंत्र का है, जो सिंधिया को शिकस्त देने वर्षो से ऐड़ी चोटी का जोर लगा, सतत सत्ता की मलाई लूट मजे करते रहना चाहते है। क्योंकि वह अच्छी तरह समझते है कि जब तक सिंधिया परिवार का हस्तक्षेप सियासत में रहेगा तब तक न तो उनके मंसूबे कामयाब हो पायेगें न ही वह ग्वालियर-चंबल में एक छत्र राज कर पायेगें। मगर धीरे-धीरे बात राजनीति सियासत को छोड़ वंचित पीडि़त मानवता के दर तक आ पहुंची है। जिसमें उसका कचूूमर निकलना स्वभाविक है। क्योंकि सिंधिया की अपनी मर्यादा है और सियासी षडय़ंत्रकारियों के अपने एजेन्डे। 

देखना होगा ऐसे में शहर के संभ्रात बुद्धिमान भले लोग पीडि़त वंचित लोगों के साथ स्वयं को कैसे सुरक्षित कर पाते है यह सोचनीय विषय है। 
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