पीडि़त वंचित अन्नदाताओं पर गरजी संगीने, मंदसौर में बाजिव हक मांग रहे, 6 किसानों की मौत

विलेज टाइम्स समाचार ऐजेन्सी/म.प्र. मंदसौर। कभी इल्ली, कभी बेमौसम बारिश, कभी अतिवर्षा, तो कभी ओलावृष्टि के बावजूद म.प्र. के पीडि़त वंचित किसान अन्नदाता विगत कुछ वर्षो से म.प्र. को केन्द्र का सर्वोच्च कृषि स मान कृषि कर्मट पुरुस्कार दिला, म.प्र. क सरकार का सर ऊंचा करते रहे। तो कुछ असहनीय दर्द, पीढ़ा के चलते आत्महत्या भी करते रहे, तब भी बैचारे हमारे अन्नदाता चुप ही रहे और कुछ नहीं बोले। जब उनके खून पसीने की कमाई उसकी फसल का मण्डियों में औने-पौने दाम खरीदना, बेचना तथा कम तौल से बैचेन हो चुप रहना और उन्हें सियासी षडय़ंत्रों के तहत तथाकथित लोगों द्वारा न बोलने देना एक अलग बात है। तमाम उत्पीडऩ के बाद जब वह अपना दर्द अपनी पीढ़ा लेकर भोपाल से लेकर मालवा तक की सडक़ों पर उतरे तो उन्हें उत्पाती मान उनका आन्दोलन कुचलने के नाम सरेयाम सडक़ों पर संगीने गरज उठी और 6 किसान शहीद हो गये। 
            आ िार क्या हुआ पीडि़त वंचितों की सेवा में जुटी म.प्र. सरकार को, जो उसकी संगीने पीडि़त वंचितों से संवाद की जगह गोलियां उगलने लगी। जिनका निशाना न तो हवा, आसमान रहा, न ही जमीन देख सका और सीधे पीडि़त वंचित अन्नदाताओं के सीनों को भेद गई। परिणाम कि हमारे 6 किसान अन्नदाता अपनी कड़ी मेहनत, अपने खून पसीने से पैदा की गई फसल के बाजिव दाम हासिल करने के संघर्ष में संगीनों से निकली गोलियों का शिकार हो हमेशा हमेशा के लिये शान्त हो गये। 
         आ िार उन पीडि़त वंचित अन्नदाताओं का क्या कसूर था जो उन्हें उनकी मेहनत का यह परिणाम मिला। उन निढाल निर्दोष अन्नदाताओं को क्या पता था कि जिस शासन, सरकार का सर ऊँचा करने वह अपनी कड़ी मेहनत से लोगों का पैट भरने पीढ़ी दर-दर पीढ़ी बगैर किसी शिकायत के सेवा करता आ रहा है। कभी उसी सरकार की संगीने उनका बाजिव हक फसल का दाम मांगने पर, उनका ही सीना छल्ली कर देगी। 

         आज वंचित पीडि़तों का यह हर्ष और दर्द देख पीडि़त मानवता नहीं स्व. पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी भी की आत्मा भी दुखित हुई होगी। जिन्होंने अपना समुचा जीवन पीडि़त वंचितों के लियेे समर्पित किया है। आज स्व. गांधी जी की ग्राम स्वराज की कल्पना भी शर्मिन्दा होगी जो उन्होंने देश को आजाद कराते वक्त की होगी। 
          सबसे बड़े अफसोस की बात तो यह है कि वंचित, पीडि़त मानवता की सेवा में विगत 13 वर्षो से खजाना लुटाने वाली सरकार को आखिर ऐसा क्या हुआ जो आज उसे यह दिन देखना पड़ रहा है। काश म.प्र. की सरकार इन 13 वर्षो में यह आंकलन कर पाती म.प्र. में आज सबसे पीडि़त, वंचित छोटे लघु सीमान्त किसान ही है। जिन्हें लागत मेहनत तो दूर मजदूरी तक नसीब नही हो पा रही। जिन किसान अन्नदाताओं को सहज बिजली, शुद्ध पेयजल, सुरक्षा, स्वास्थ, शिक्षा, राजस्व बैंक के उन सौपानों से संघर्ष कर, जिन्दा रहना पड़ता है। तथा कड़ी मेहनत के बाद उत्पादित फसल के लिये खरीददारों के हाथों भी शोषित हो तोल के नाम लुटना पड़ता है। जिन्हें पूंजी मेंहताना तो दूर की कोणी भाड़े तक का दाम खुद चुकाना पड़ता हो कभी कभी मजबूरन किसान को कड़ी मेहनत कर्जे से उगाई गई फसल को भी मजबूरन सडक़ फैकना पड़ता है। आ िार इस दर्द और पीड़ा को जानने की जबावदेही किसकी है, कई सवाल है कई जबाव। मगर धर्म संकट यह है कि सीधे साधे अन्नदाताओं के बीच इतना आक्रोश क्यों? 
जय स्वराज
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