प्रभावी भूमिका से भागती कॉग्रेस

व्ही.एस.भुल्ले : कहते है कि अगर मर्ज नासूर हो और दवा नसाज तो ऐतिहात और परहेज बड़ा काम करता है और मरीज का मर्ज ठीक और आयु भी लंबी हो जाती है। मगर यहां तो लगता है कि कॉग्रेस पर दोनों ही तरकीब काम नहींं कर पा रही। जिस मर्ज का शिकार कॉग्रेस विगत 7-8 वर्षो से ही नहीं, विगत 20-25 वर्षो से है। वह उससे निजात नहीं पा-पा रही कारण साफ है कि बोलने में न तो कॉग्रेस का कोई संयम है और न ही उसे वेवजह के मुद्दों पर बोलने में कोई परहेज, न ही वह जड़ से नासूर मिटाने सर्जरी करने को तैयार और वह बार-बार अपने ब्यानों के जरिये उन्हीं नीम हकीमों पर विश्वास जता रही है। जो कॉग्रेस में इतने बड़े नासूर के जिम्मेदार है। फिर चाहे वह उसके वह प्रतिद्वन्दी दल हो, या फिर उसके वह नेता, जिन्होंने भाषण वीर बन, कॉग्रेस को यहां तक पहुंचाया है और सारा दोष कॉग्रेस आलाकमान या भावी आलाकमान पर मड़ डाला। 

अगर कॉग्रेस आज भी अपने बोलो पर संयम रख, संवेदनशीलता के साथ विकास के मुद्दों पर प्रभावी ढंग से बात रखे, तो कोई कारण नहीं जो कॉग्रेस की खोई शौहरत उसे मय मूल, ब्याज के न मिल सके। मगर इसके लिये कॉग्रेस को कॉग्रेस में एक बड़ी सर्जरी को करना होगा जैसी कि शुरुआत हुई है।  

वहीं विपक्षी दलों द्वारा समय-समय पर प्रायोजित मुद्दों पर बोलने से परहेज रखना होगा जरुरी हो तो कम शब्दों में प्रभावी बात कॉग्रेस की ओर से होना चाहिए। जिससे कॉग्रेस का अहम मुद्दों पर मत स्पष्ट एवं विपक्षियों को प्रायोजित षडय़ंत्रों का माकूल जबाव मिल सके। चीखने चिल्लाने से अगर कुछ हासिल होता तो प्रकृति गवाह है इन्सानों की तरह जंगलों मे भी सियारों के बड़ी मात्रा में सुन्दर घर होते। कहने का तात्पर्य तर्क प्रभावी, संयमित एवं राष्ट्र, जनकल्याण से जुड़े हो, न कि सियासत से। 

फिलहाल तो तू-तू, मैं-मैं के बीच सुधार दूर-दूर तक नजर नहीं आता, न ही संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने कोई कारगार कदम नजर आता, जो कॉग्रेस के लिये आज यक्ष प्रश्र होना चाहिए और उसका उत्तर भी स्वयं कॉग्रेस आलाकमान को जल्द ही ढूंढना चाहिए। क्योंकि 3 वर्ष का लंबा समय वैसे भी रुठने मनाने में निकल गया अब तो कॉग्रेस स्थिति बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए। जो कॉग्रेस के साथ चलना चाहे, उनका स्वागत और न साथ चलकर बाहर जाना चाहते है उनका भी स्वागत होना चाहिए।
जय स्वराज 
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