राजनीति की भेंट चढ़े राष्ट्र के तीन साल प्रभावी नेतृत्व के लाभ से वंचित रही सरकार

व्ही.एस.भुल्ले, भारतीय राजनीति में एक लंबे अन्तराल पश्चात जो प्रभावी नेतृत्व सरकार को मिला, शायद सरकार उसका संपूर्ण लाभ नहीं उठा सकी। और समुचा राष्ट्र उस लाभ से एक मर्तवा फिर से वंचित हो गया। और देखते ही देखते देश के 3 वर्ष राजनीति के भेंट चढ़ गये। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। कि अभी से तीन वर्ष पूर्व आक्रमक रणनीत के साथ राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शुरुआत करने वाली भाजपा नेतृत्व वाली एन.डी.ए सरकार ने प्रभावी नेतृत्व के रहते एक नई पहचान और कई जनकल्याण, राष्ट्र कल्याण की नीतियां बनाई साथ ही पूरी सूझ-बूझ के साथ कई सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों पर काम किया।

देश की व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करने का संदेश देने वाली सरकार वह परिणाम देने में अक्षम असफल साबित रही। जिसकी उम्मीद स्वयं सरकार समाज और राष्ट्र को थी, कारण सटीक सोच पारदर्शिता और क्रियान्वयन में कोताही रहा, काश सरकार ने प्रभावी नेतृत्व का लाभ उठा सटीक शुरुआत की होती। तो परिणाम कुछ और ही होते। 

देखा जाये तो देश के प्रधानमंत्री ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका का जो खाका खींच पहचान कायम कि उसका कोई बहुत अधिक लाभ राष्ट्र लाभ को, न तो निवेश, न ही तकनीक के रुप में हासिल हो सका। जहां तक राष्ट्रीय स्तर का सवाल है तो अपने-अपने राजनैतिक वर्चस्व और हमारी संघीय व्यवस्थागत मजबूरी के चलते कई जनकल्याण, राष्ट्र कल्याण से जुड़ी महात्वकांक्षी योजनाओं का उतना लाभ राष्ट्र को नहीं मिल सका, जिसका वह हकदार था। 

देखा जाये तो देश में अघोषित रुप से छिड़े राजनैतिक बजूद के संघर्ष ने 3 वर्ष का प्रभावी समय सत्ता की खातिर बर्बाद कर दिया। इस बीच इन 3 वर्षो में कई राष्ट्र, जनकल्याण से जुड़ी योजनायें बड़े ही आक्रमक ढंग से सामने आयी। जिनके सतही क्रियान्वयन की सटीक कोशिशे भी हुई, मगर संभावित परिणाम नहीं मिल सके। 

फिर चाहे वह  प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई, बागवानी, वन बीमा, स्वच्छता, आवास, फ्री गैस चूल्हा, जनधन, जनश्री, अटल पेन्शन, मु्रदा बैंक, स्ट्राटप, स्केल इण्डिया, मेकइन इंडिया, डिजिटल इंडिया, कैश लैश इंडिया सहित भ्रष्टाचार, बेनामी स पत्ति मुक्त व्यवस्था जैसे कई कार्य प्रचलन मे आये। मगर इस बीच इस राष्ट्र के सबसे अहम कई मुद्दें स्पष्ट विजन, डिटेल, डी.पी.आर. के अभाव में अछूते ही रहे। मगर कुछ ऐतिहासिक बदलाव अवश्य हुये।  
इतना ही नहीं, राजनैतिक बजूद के लिये छिड़े संग्राम ने हमें हमारी संस्कृति से वंचित कर दिया और सरकार व सत्ताधारी दल देश की प्रतिभाओं विधाओं से मिलने वाले लाभ से वंचित ही रहे। और हमारे जीवन मूल्य पथराई आंखों से इस राजनैतिक संग्राम मायू्सी भरी नजरों से देख बेबस और मजबूर दिखे। 

ये सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपनी मजबूरी होती है तो दूसरा पक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्र को समर्पित एक वर्ग विशेष का खुला साथ भी जिन्हें विलक्षण प्रतिभायें या विद्ववान कहा जाता है। शायद सरकार दलगत, रसूख और सत्ता विस्तार के अभियान में इतनी व्यस्त हो गई कि उससे उसकी परंपरा, संस्कृति दूर होती रही। और परिणाम कि स्वयं मान-सम्मान, अभिमान में डूबी सत्तावत राजनीति यह तय ही नहीं कर सकी। कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता से जुड़े या सत्ता दूर बैठे, राष्ट्र भक्तों का उत्तरदायित्व क्या है, जिससे एक सशक्त, स पन्न, खुशहाल राष्ट्र का निर्माण संभव और सफल हो सके। 

बहरहाल सरकार व सत्ताधारी दल के पास एक प्रभावी नेतृत्व के अभी भी डेढ़ वर्ष बाकी है अगर सरकार और सत्ताधारी दल चाहे तो मात्र एक वर्ष में ही वह परिणाम देश को हासिल हो सकते है। जिसकी कल्पना शायद ही सरकार और सत्ताधारी दल ने की हो। क्योंकि हमारी संस्कृति कहती है कि अगर स्वस्थ समृद्ध जीवन जीना है तो शुद्ध पेयजल प्राप्त करने खोज भी स्वयं को करनी होगी है और प्रयास भी स्वयं को करने होगेंं, वरना सत्तावत राजनीति का क्या यह तो आती जाती रहती है, मगर प्रभावी समय और मौके कम आते है। जय स्वराज
  
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