अजब पीढ़ा है मेरे पंच परमेश्वरों की...........तीरंदाज ?

व्ही.एस.भुल्ले,  भैया-  प्रभु भोलेनाथ ने तो जीव जगत और भक्तों की खातिर हलाहल तक हलक में उतार लिया था और उस हलाहल से राहत पाने वह अमरनाथ जा पहुंचे थे जैसी कि क्विदंती है। आखिर प्रभु ने इतना बड़ा त्याग अपने भक्तों की खातिर ही तो किया था। चूंकि प्रभु तो त्रिलोकी नाथ है, नाथो के नाथ भोलेनाथ है सो उनकी महिमा तो अपरमपार है जिसे भूतो न भविष्यते: कोई नहीं पा सकता। मगर हमारे महान देश की व्यवस्था में आम जन, जीव और जीवन की बेहतरी के लिये पंच परमेश्वरों के न्याय और कर्तव्यों को लेकर जनसेवा के लिये एक क्विदंतियां रही है। शायद ग्राम स्वराज का सपना देखने वाले गांधी जी ने भी पंच परमेश्चरों की निष्ठा ईमानदारी त्याग और न्याय पूर्ण व्यवहार को देख, ग्राम स्वराज की कल्पना की होगी। 
        
मगर सुना है जब से पंच परमेश्वरों को हरिद्वार में गंगा डुबकी लगाने के बजाये जनकल्याण, ग्राम कल्याण के लिये बाबा अमरनाथ, केदारनाथ के दर्शन जैसा कर्तव्य निभाने का हुकुम हुआ है। विगत 10 वर्षो से हरिद्वार में ही गंगा स्नान कर, जनकल्याण के नाम पुण्य कमाने वालो की सांस हलक में अटकी पड़ी है। कहने का तात्पर्य कि भ्रष्टाचार के नाम बदनाम हो चुकी, पंचायतीराज व्यवस्था को दुरुस्त करने जो नया फॉर्मूला सत्ता को विकेन्द्रीकृत कर गांव, गली, गरीब का विकास के लिये अपनाया है वह म्हारे पंच परमेश्वरों को किसी उल्टी क्रिया करने से कम नहीं। अगर यो कहें कि फिलहाल म.प्र. में त्रिस्तरीय पंचायतीराज में पंच परमेश्वरों की सांस ग्राम विकास को लेकर हलक में अटकी पड़ी है तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

भैये- बाबा अमरनाथ की पवित्र यात्रा के वक्त आखिर तने क्यो म्हारे पंच परमेश्चरों को कोस रहा है और निर्माण विकास कार्य के नाम हलक में अटकी सांस पर क्यों मसखरी कर रहा है। कै थारे को मालूम कोणी कि म्हारे मुख्यमंत्री ने प्रदेश की कमान संभालते ही भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था देने के लिये सुधार की शुरुआत गंगोत्री से करने की बात कही थी। सो भैये शुरुआत गंगोत्री से ही हुई है और सुदूर संपर्क कच्ची सडक़, सीसी रोड़, शौचालय, मुक्तिधाम, खेल मैदान, कूप निर्माण, वृक्षा रोपण, तालाब निर्माण इत्यादि के निर्माण स्टैण्र्ड निर्धारित कर मजदूरी सहित मशीन उपयोग की दरें निर्धारित भूपाल से ही कर दी है और भुगतान की व्यवस्था भी तत्काल ऑनलाइन कर दी है। साथ ही मलाई काटने वाले इन्जीनियरों व सचिवों की जमात को मूल्यांकन प्रेरणा देने की जबावदेही सौंप दी है। जिनकी शिकायत से सरकार विगत वर्षो से परेशान थी और पंच परमेश्वरों की निष्ठा ईमानदारी पर उठते सवालों को लेकर हैरान थी। 

भैया- तो क्या सरकार नेम्हारेपंच परमेश्चरों सहित रोजगार सहायको को फ्री हेंण्ड कर दिया है।

भैये- अब सच क्या है, ये तो सरकार और शासन के मुखिया ही जाने, मगर निर्माण का स्टैण्र्ड और उसकी कीमत को तय देख, फिलहाल तो पचं परमेश्चरों का पसीना छूट रहा है। 

भैया- मने न लागे विगत 10 वर्षो से गंगा स्नान में जुटी पंच परमेश्वरों की मण्डली इतना बड़ा बोझ कन्धों पर डाल, प्रभू केदारनाथ पहुंचना तो दूर की बात मने तो लागे वह गंगोत्री तक भी नहीं पहुंच पायेगी। क्योंकि हरिद्वार पहुंचने तक तो कोई दिक्कत नहीं। मगर इसके आगे पैदल चल केदारनाथ धाम तक कैसे पहुंच पायेगी, यह सोच हारा तो कलेजा हलक को आवे। 

फिलहाल तो भैये पंच परमेश्चरों की मंण्डली के मण्डेलेश्वर को हर गुरुवार को टी.व्ही. पर देख, विभिन्न मटों  के महंतों के हालात भी कुछ ठीक नहीं। सो महंतों ने भी पुजारियों को स्पष्ट ताकीत की है कि निर्धारित समय पर ही यात्रा पूर्ण होनी है। जो भी इस यात्रा में पिछड़ेगा वहीं महामण्डेलेश्वर के कोप का शिकार होगा। देखना होगा कि आने वाले समय में खुशी-खुशी गंगा में डुबकी लगा, अपने पान धोने वाले हारे पंच परमेश्वरों में से कितने चारों धाम की सफल यात्रा कर, जनकल्याण,  ग्राम कल्याण का पुण्य कमाते। 
जय जय श्रीराम 
  
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