सियासत के बदलते सलीको से सांसद में गांव गरीब

व्ही.एस.भुल्ले : प्रचलित सियासत में लगता है धीरे-धीरे मुद्दा, अब हमारे जीवन मूल्य, संस्कृति, पर परा नहीं, शायद वह सत्ता है जो आज तक अपने अहम अहंकार को हर कीमत पर कायम रखती चली आ रही है। ऐसे में जब राजनैतिक विशाद ऐसी हो तो सबा सौ करोड़ से अधिक देश वासियों के सामने सबसे अहम मुद्दा देश के मान-सम्मान स्वाभिमान और रोटी, कपड़ा, मकान के साथ उस सत्ता में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने का है। जो अधिकार प्रकृति ने ही नहीं, उस सर्वोच्च सत्ता ने भी हर जीव जगत ही नहीं, मानव जगत को भी खुशहाल जीवन जीने के लियेे दे रखा है।

मगर सत्ता तक का मार्ग तय करने वाली हमारी परंपरा संस्कृति और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी जटिल और बेहरहम हो जायेगी किसी ने शायद सपने में भी न सोचा होगा। आज जिस तरह की सियासत का प्रादुर्भाव हमारे महान लोकतंत्र में हो रहा है वह उचित नहीं। और तब कि स्थिति में जब व्यवस्थागत आम मासूम कलफ रहा हो, और सियासतदारों को सिर्फ सत्ता सिंहासन ही सर्वोच्च लगने लगा हो। वह भी तब जब जनकल्याण, राष्ट्र कल्याण  के नाम मौजूद व्यवस्था में 80 करोड़ से अधिक लोग व्यवस्था गत सत्ता सौपानों तक सीधे पहुंचने में अक्षम हो या फिर सियासत की मजबूरी ने उन्हें वंचित कर रखा हो, जहां गांव गरीब सत्ता में हनक बनाने संघर्षरत हो, वहीं विरासत में मिली सियासत आज सत्तारुढ़ हो। ऐसे में गांव, गरीब का चिन्तित होना स्वभाविक है।  

अब ऐसे में कैसे होगा सबका साथ, सबका विकास अगर हम देखे तो हमारे महान देश में हजारों विधानसभा सैकड़ों लोकसभा व लाखों ग्राम पंचायतें, परिषद मौजूद हो, जहां सियासत की तूती बोलना स्वभाविक है। सियासत के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी है और समय वेसमय हार-जीत के परिणाम भी और सत्ताओं की असीम ताकत वाली नजीरे भी। 

मगर 70 विधानसभा सीटों वाली छोटे से राज्य दिल्ली में जो सियासत विगत 2-3 वर्षो से परवान चढ़ रही है वह देश के आम नागरिक ही नहीं गांव गरीब को सोचने पर मजबूर कर देती है। दिल्ली की सियासत को देख, किसी बिना दांत के शेर पर शिकार के आरोप उतने ही हास्यपद प्रतीत होते है जैसे किसी पोपले व्यक्ति पर पान चबाने के। 

ऐसे में देश भर की तथाकथित मीडिया, बड़े-बड़े सत्ताधारी दल पूरे इस कदर जोर आजमा रहे जैसे समुचा देश सिर्फ और सिर्फ दिल्ली में ही बसता हो। आज एक जरा से दल को निस्तनाबूत करने जिस तरह की सियासत का प्रार्दुभाव भारतीय राजनीति में होने जा रहा है, हो सकता है उसके दूरगामी परिणाम हमारी राजनीति को विचलित करते हो। जबकि अगर हम दिल्ली राज्य से बाहर देखें, कई राज्यों ऐसी सरकारें है या सत्ता से दूर जा चुकी है जिन सरकारों के कई ल बरदार या तो आखंण्ड भ्रष्टाचार में डूबे है या उन पर आरोप है। जो अपने अहम अहंकार के चलते आम मासूम को खूंन के आंसू रुलाने भी पीछे नहीं। अपुष्ट सूत्रों की माने तो जिन लोगों पर कभी फूटी चबन्नी भी नहीं होती थी वह आज लाखों करोड़ों ही नहीं, अरबो में खेल रहे है। अब यह र्दुगति हमारे लोकतंत्र में व्यक्तिगत हो या सामूहिक  चर्चा तो आजकल यहीं है।  

वहीं गांव, गली के लोग आज लोकतंत्र की यह हालत देख, अपनी मजबूरी पर बिलबिला रहे है। आज हमारे महान राष्ट्र में न तो कोई स्पष्ट विजन, डिटेल, डी.पी.आर नजर आ रही, न ही कोई प्रमाणिक मूल्यांकन। ऐसे में हमारा देश  कैसे खुशहाल संपन्न बनेगा यह चिन्ता की बात है। 
जय स्वराज 
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