सत्ता शीर्ष का धर्म, राष्ट्र व जनसेवा तथ्यहीन सियासी सवाल स्वराज में बड़ी बाधा

व्ही.एस.भुल्ले: सत्ता स्वार्थ के चलते जिस तरह से भ्रामक, तथ्यहीन सवालों के सहारे राजनैतिक लाभ उठाने का जो प्रचलन आज की राजनीति में चल निकला है, वह स्वराज के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि अनादिकाल से भारत के लोग अपने जीवन मूल्य, परंपरा व महान संस्कृति, संस्कारों के लिये जाने जाते रहे है। और इस बीच हमारे महान राष्ट्र में कई वैभवशाली, सत्तायें, सम्राट, शासक सरकारें रही और आजाद भारत में आज भी है।
 

हालिया सियासी, मगर राजनीति को शर्मसार करने वाला व्यान सत्ता शीर्ष से म.प्र. में आया है, वह भी मात्र एक उपचुनाव में जीत हासिल करने सिंधिया राजवंश को लेकर, जो सिद्धान्त, मूल्य की राजनीति करने वालों के लिये बड़ा ही शर्मसार करने वाला है। 

हालाकि दूसरे ही दिन मीडिया द्वारा उछाले सवाल की भरपाई करने स्वयं के सवालों में अनौपचारिक संसोधन करते हुये, सफाई भी दी। मगर शायद वह स्वयं भी भूल गये कि राज, राष्ट्र व जनसेवा का एक लंबा कॉरवां उनके 13 वर्ष के शासनकाल में उनके साथ रहा है। फिर चाहे वह लाडली लक्ष्मी कन्यादान, तीर्थदर्शन और 75 प्रतिशत अंक प्राप्त छात्र-छात्राओं की दशा व दिशा तय करने का बहुमूल्य निर्णय रहा हो। मगर न जाने उन्हें अपनी राजसेवा, जनसेवा से बड़ा सियासी लाभ ऐसे आरोपित सवाल में क्यों दिखा, जो भ्रामक, तथ्यहीन और संस्कृति, संस्कारों के विरुद्ध है। अपने 13 वर्ष के समुचे कार्य काल में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से दूर रह, राज व जनसेवा में लीन रहने वाला वह सत्ता शीर्ष कैसे भ्रमित हो गया और इतनी बड़ी चूक कर गया। जिसको लेकर अब जनचर्चा सरगर्म है।  

बहरहाल कहते है कि बन्दूक से निकली गोली और जुबान से निकली बोली कभी खाली नहीं जाती। सो फिलहाल सवाल को लेकर सियासी बाजार गर्म है। अगर हम उछाले गये सवाल, कि सिंधिया राजवंश ने अंग्रेजों से मिल भिण्ड के लोगों पर बड़ा अत्याचार किया है। अगर हम इस तथ्य की तहतक जायें तो पहले हमारे वीर, सम्राट, राजा, रजबाड़ों का शासन रहा, फिर मुगलों का शासन रहा, तो देश के कुछ भाग पर मराठाओं का शासन भी था। उसके बाद अंग्रेज आये और 1857 तक वह पूरे देश में फैल गये। कुछ जगह वह सीधे सत्ता में थे, तो कुछ जगह उन्होंने कई रियासतों से स्वयं की सुविधा अनुसार सन्धियां कर रखी थी। 

ऐसे में अंग्रेजों के बढ़ते दबाव व अत्याचारों से परेशान कुछ राज्य व जागीरदारों ने अंग्रेजों का झण्डा बुलन्द करने के बजाये खुले संघर्ष का रास्ता इकस्तियार किया। तो कुछ राजे-रजबाड़ों व जागीदारों ने अंग्रेजों की अत्याचारी नीतियों के विरुद्ध अंग्रेजों से युद्ध छेड़ दिया। तो कुछ लोगों ने प्रजा को अंग्रेजों के अत्याचारों से बचाने अंग्रेजों की शर्तो को मान लिया। जो लोग नहीं माने उन्हें अंग्रेजों ने ताकत कि बल कुचल दिया और अंग्रेजों ने हमारी अपनी कमजोरियां का लाभ उठा, निर्विवाद रुप से 14 अगस्त सन 1947 तक भारत पर राज किया। जिसे एक बार पुन: राष्ट्र भक्तों द्वारा एक जुट हो, इसे देश से खदेड़ दिया, आजादी के बाद आजाद भारत में जब अन्य रिहासदों को मर्ज किया जा रहा था। इस दौरान सिंधिया स्टेट भी भारत में मर्ज हो गयी उसके बाद कुछ समय कॉग्रेस में रहने के बाद सिंधिया राजवंश की मुखिया राजमाता विजयाराजे सिंधिया ग्वालियर के छात्र आन्दोलन पर हुई गोलीबारी व दो छात्रों की हत्या से व्यथित राजमाता उस समय के गृहमंत्री, मुख्यमंत्री से मिली। मगर वह ग्वालियर के छात्रों पर हुये जुल्म को सह नहीं पाई। और वह जनसंघ में शामिल हो गयी और डी.पी. मिश्रा सरकार का पतन हो गया। जब देश में इन्दिरा गांधी जी ने इमेरजेन्सी लगाई तो वह डेढ़ माह तक जेल में रही। मगर उन्होंने जमानत नहीं ली, और बरेली से इन्दिरा जी के खिलाफ चुनाव लड़ा। आयोध्या कार सेवा में भी उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। और इमरजेन्सी के बाद भाजपा के रुप में नये दल के गठन मेंं तन, मन, धन, से साथ दिया। और वह जनसेवा में जीवन पर्यन्त बगैर किसी पद प्रतिष्ठा के जुटी रही। इस बीच उन्होंने भाजपा को एक से एक फायर ब्रान्ड नेता दियेे। 

यहां तक कि वह समुचे जीवन अपने इकलौते पुत्र से पार्टी की खातिर दूर ही रही। मगर इतना सब कुछ होने के बावजूद उन्हीं के परिवार पर, उन्हीं के दल से शर्मसार करने वाला सवाल आज की सियासत को किस दौर में ले जायेगा कहना मुश्किल है।

वहीं दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री है जिन्होंने चुनाव के दौरान राजमाता की कर्मस्थली शिवपुरी की सभा में कहा था कि न तो भाजपा का हर कार्यकर्ता न ही इस क्षेत्र के लोग राजमाता साहब के योगदान को नहीं भुला सकते। जिस तरह बाद-विवादों से दूर देश के प्रधानमंत्री दिन रात एक कर देश व देश की पीडि़त मानवता की सेवा में जुटे है। और जो शुरुआत प्रधानमंत्री के आदर्शो पर चल उ.प्र. के नये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उसकी समुचे देश में चर्चा है। शायद सत्ता शीर्ष का पहला धर्म और कर्म यहीं होता है। फिर 13 वर्ष के सुनहरे कार्यकाल के बाद म.प्र. का सत्ता शीर्ष कैसे सियासी दल-दल में उलझ गया, फिलहाल कहना मुश्किल है। 
                                जय स्वराज 
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