सियासत के निशाने पर सिंधिया राजवंश

व्ही.एस.भुल्ले: सिंधिया राजवंश की सबसे लोकप्रिय और ताकतवर मुखिया के रुप में प्रसिद्ध स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने जनसंघ सहित भाजपा पर अपना सारा वैभव, तन, मन, धन लुटाते वक्त शायद यह कभी न सोचा होगा कि जिस दल व जिन राजनैतिक नेताओं को वह पीडि़त मानवता की सेवा के लिये खून पसीने से सींच रही है। जिस दल के लिये वह अटल, आडवाणी, सुषमा स्वराज, पटवा कैलाश जोशी, उमा भारती, मोदी जैसे नेता तैयार करने में माहती भूमिका निभा रही है। कभी उस दल के नेता ही उनकी मिट्टी को मरघट की मिट्टी या फिर सिंधिया राजवंश को अंग्रेजों का साथी बता अत्याचारी करार देगें? 

मगर उसी सिंधिया राजवंश की संपत्ति में स्कूल चला व उसी सिंधिया राजवंश के धन से राजनीति चमकाने वाले दल के इन नेताओं को शायद ही आभास हो कि वह जिस गौरव का एहसास सत्ता में बैठ महसूस कर रहे है, जिस सियासत के लिये वह आज सिंधिया राजवंश पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे है। उस दल को गौरवशाली बनाने और भाजपा को यहां तक पहुंचाने में सिंधिया राजवंश का एक बड़ा योगदान रहा है, जैसा कि उनकी पुत्री ने भी व्यथित हो, खबरनबीसों द्वारा पूछे सवालों पर व्यक्त किया है। 

ज्ञात हो कि जब ग्वालियर छात्र आन्दोलन के दमन के दौरान गोली में दो छात्रों की मृत्यु हुई तो उससे आहत सिंधिया राजवंश की तत्कालिक मुखिया श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अकेले के ही दम पर डी.पी. मिश्रा की अहंकारी सरकार को तख्ता पलट कर, उसे सत्ता से बाहर कर दिया था। और उस समय वह एक ऐसे चर्चित चेहरे के रुप में देश के सामने आयीं और इसके बाद उन्होंने अपने सेवा भावी राजनैतिक जीवन में कभी मुडक़र नहीं देखा, वह जमाना जनसंघ का था। 

इतना ही नहीं भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी से भी सन 1977 के आपातकाल में जनसंघ में रहते हुये उन्होंने हार नहीं मानी और एक जीवट महिला के रुप में इन्दिरा गांधी जैसी ताकतवर प्रधानमंत्री से भी लोहा लेने में पीछे नहीं रही। उन्होंने दल की खातिर इन्दिरा गांधी के खिलाफ बरेली जाकर चुनाव लड़ा। इतना ही नहीं इमरजेन्सी में जेल जाने पर उन्होंने दल के मान-सम्मान और स्वाभिमान की खातिर अपनी जमानत तक नहीं कराई। जनसंघ व जनता पार्टी की सरकार के निर्माण तक कै. श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तन, मन, धन से भाजपा की सेवा की इतना ही नहीं, सन 1992 की आयोध्या कार सेवा में भी वह प्रमुख चेहरा रही। 

यहां उल्लेखनीय बात यह है कि बावरी विध्वंश के बाद जब भाजपा के बड़े-बड़े नेता जांच आयोग, सीबीआई से मुंह छिपाते घूम रहे थे। तब स्व. राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने ही टी.व्ही. पर पूरी दृढ़ता से भगवान राम में अपनी गहरी आस्था व्यक्त की और होने वाली किसी भी कार्यवाहीं को स्वीकार किया। 
   
समुचे जीवन बगैर किसी सत्ता पद लाभ के भाजपा को मुकाम देने वाली कै. स्व. राजमाता के परिवार पर  आज हो रहे, सियासी सवालों का क्या अर्थ है यह तो सवाल खड़े करने वाले ही जाने। जबकि ज्ञात हो कि हालिया लोकसभा चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राजमाता की कर्म भूमि शिवपुरी में कहा था कि राजमाता का पार्टी व कार्यकत्र्ता के प्रति क्या समर्पण था मैं जानता हूं। किस तरह वह पार्टी और कार्यकर्ताओं की चिन्ता करती थी।  

मगर र्दुभाग्य इस सियासत का कि उन्हीं राजमाता की मिट्टी को उन्हीं के दल के लोग कभी मरघट की मिट्टी कहते है, तो कभी सन 1857 के संग्राम में सिंधिया राजवंश पर उंगली उठाते है। अब स्वयं प्रदेश के मुखिया भी भिण्ड की सभा में कह गये कि सिंधिया ने अंग्रेजों से मिलकर भिण्ड के लोगों पर बड़ा अत्याचार किया है, जिसकी चर्चा मीडिया जगत में बड़ी सरगर्म है। हालाकि प्रदेश के मुखिया उमरिया ने राजमाता को लोकमाता भी कहते नहीं थके। 

मगर जैसी कि चर्चा है कि प्रदेश की भाजपा सरकार के मुखिया के मुख से निकले बोल पर गर्मराती राजनीति के बीच विपक्षी दल कॉग्रेस ने भी लाभ उठाते हुये सवाल कर डाला कि अगर सिंधिया राजवंश ने अंग्रेजों से मिल लोगो पर अत्याचार किया है। तो राजस्थान की मुख्यमंत्री बसुन्धरा राजे, म.प्र. सरकार में कै. स्व. राजमाता की भावी नगरीय प्रशासन मंत्री माया सिंह और उनकी छोटी बेटी यशोधरा राजे सिंधिया खेल एवं धर्मस्य राज्य मंत्री भाजपा सरकारों में क्यों है। 

बहरहाल जो भी हो, पीडि़त मानवता की सेवा करने संगठन खड़ा करने वाले महापुरुषों के खिलाफ इस तरह की ब्यानबाजी म.प्र. की राजनीति को कहां ले जायेगी कहना मुश्किल है। मगर सियासत से निकले इन सवालों पर बहस छिड़ी तो इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि बात दूर तलक जायेगी। क्योंकि गौरवशाली इतिहास धूमिल हो सकता है मगर राजनीति से ओझल नहीं? 
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