शिवराज के निशाने पर, फिर सिंधिया

व्ही.एस.भुल्ले। विगत वर्ष से पार्टी के अन्दर और बाहर म.प्र. की राजनीति में मूल्य, सिद्धान्तों, पर पराओं को नई दिशा देने संघर्षरत सिंधिया हाल ही में अटेर उपचुनाव में शिवराज सरकार को शिकस्त देने के बाद फिर शिवराज के निशाने पर है। इस मर्तवा शिवराज ने बड़ी ही साफगोई के साथ पूर्व केन्द्रीय मंत्री सांसद श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनके परिवारिक आभा मण्डल से अलग करने का प्रयास, अपने उद्बोधन में कर यह संदेश साफ कर दिया है। कि वह सिंधिया को लेकर सियासत के किसी भी पायदान पर जाने से हिचकने वाले नहीं, फिर वह आरोप सार्वजनिक हो, या व्यक्तिगत। 

हालिया मसला भाजपा कार्य समिति की बैठक समापन के अवसर पर म.प्र. के मु यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने म.प्र. के धार जिले में मोहन खेड़ा तीर्थ स्थल पर दिये गये उदबोधन का है, जिसमें उन्होंने कहा कि वह न तो बसुन्धरा राजे, न ही यसोधरा राजे की बात कर रहे है। राजमाता सिंधिया भी सिर्फ राजमाता नहीं लोकमाता थी। वे हमारी प्रेरणा श्रोत है, जो राजमाता के रास्ते पर नहीं चलेगा, उसे आदर नहीं मिलेगा। उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम लेते हुये आश्चर्य व्यक्त करते हुये कहा कि जो ट्रस्ट लोक कल्याण के लिये बने होते है, उनकी जमीने उन्होंने बेच दी। जमीनों को व्यापार का साधन बना लिया। शिवपुरी जैसे जिले में जहां गरीब बसते है, ऐसी 700 एकड़ जमीन पर कब्जा कर बाउन्ड्री बॉल बना ली। 

अब म.प्र. के मु यमंत्री के व्यान, मंशा में कितनी सच्चाई है यह तो आरोप लगाने वाले म.प्र. के मु यमंत्री शिवराज सिहं ही जाने। मगर यक्ष सवाल यहां यह है कि आखिरकार मु यमंत्री जी के संज्ञान में इतने बड़े लोकहित से जुड़े मुद्दे की याद अभी क्यों आई? आखिर वह लोक कल्याण के अपने 11 वर्ष के प्रभावी कार्यकाल को भुला इस तरह की राजनीति में क्यों उलझना चाहते है, जो विगत 11 वर्षो में न तो उनके स्वभाव और न ही आभा मण्डल में रहे है। जिसमें खास तौर पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप। 

अगर चर्चाओं की माने तो सारी कवायद साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति के साथ 2018 में पुन: फूल छाप कॉग्रेसियों की मदद से जो भाजपा सरकार में सत्ता की मलाई काट रहे, लोगों के सहयोग से सत्ता वापसी की है। क्योंकि सत्ताधारी दल जानता है कि अगर कॉग्रेस आलाकमान ने सिंधिया को मु यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट कर, फ्री हेन्ड दे दिया तो सत्ताधारी दल के 15 वर्ष के परफॉरमेन्स पर सवाल होना लाजमी है। वहीं फूल छाप कॉग्रेासियों के धन्धों पर भी लगाम लगना स्वभाविक है। इसलिये हड़बड़ी वैचेनी में कॉग्रेस के अन्दर भी सिंधिया के नेतृत्व को लेकर घमासान मचा है, तो दूसरी ओर सिंधिया की प्र ार छवि को लेकर सत्ताधारी दल भी खासा परेशान है। 

राजनैतिक चर्चाओं का अन्त यहीं नहीं हुआ है अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो चतुर सुजान मु यमंत्री का इसारा स्पष्ट है। जैसा कि वह अपनी ही सरकार के पूर्व साथियों को सुनियोजित रणनीति के तहत शिकस्त देते रहे है। उसी प्रकार उन्होंने अपने मंत्री मण्डल के सहयोगियों को भी साफ संदेश दे दिया है, कि जो राजमाता के रास्ते पर नहीं चलेगा उसे आदर नहीं मिलेगा। बहरहाल मु यमंत्री के इस व्यान से प्रदेश की राजनीति फिर से सरगर्म होना तय है। 

एक कयास चर्चा में यह भी है कि सिंधिया की आर्थिक हैसियत को देखते हुये, धन्धे की जरुरत शायद ही सिंधिया को हों, आज धन्धा तो लोक कल्याण के नाम जनधन की लूट करने वाले उन सियासतदारों ने राजनीति को बना रखा है। जिनकी हैसियत कल तक न तो राजनीति करने की थी, न ही उनकी कोई ऐसी सार्वजनिक प्रतिष्ठा और पहचान, न ही लोक कल्याण के प्रति उनका कोई त्याग। ज्ञात हो कि राजमाता के 16 वर्ष पूर्व अवसान के बाद सिंधिया परिवार की आर्थिक हैसियत लाखों हजार करोड़ में आंकी गई थी। और त्याग, प्रतिष्ठा, जनसेवा का कारवां सैकड़ों वर्ष पुराना। ऐसे में इस तरह के आरोप सियासी तौर पर लगाना शायद सिंधिया के साथ अन्याय है। राजनीति मूल्य सिद्धान्त, लोक कल्याणकारी, नीतिगत हो, न कि रीतिगत। क्योंकि नीति ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार हो सकती है, न कि कोई ऐसी रीति जिसका कोई आधार ही न हो। 
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment