भावनात्मक लूट पर टिका सत्ताओं का भविष्य

व्ही.एस.भुल्ले , छवि चमकाऊ तकनीक हो या फिर भावनाओं की लूट रचित व्यवहारिक आचरण, मगर फिलहाल तो भावनात्मक लूट का फंण्डा सत्ता के गलियारों में, फुल प्रूफ मार्केटिंग के सहारे खूब फल फूल रहा है। पहले तो व्यक्ति फिर समूह अब तो संगठनात्मक रुप से यह नु सा पनप रहा है।

वर्तमान हालातों में सत्ता हासिल करने की पटकथा पर नजर डाले तो सारा मामला किसी कला मंच पर चल रहे प्ले की तरह नजर आता है। एक से एक बड़े-बड़े किरदार पैनलों में निर्देशकों की टीम, अब्बल दर्जे के यूजीशियन, उम्दा डायलॉग, सुन्दर पोस्टर, लॉन्चिग के वक्त धमाकेदार प्रीमियर और काबिल कलाकारों के द्वारा जमकर भावनाओं का खेल सत्ता के लिये चल पड़ा है। 

बात अब 5 वर्ष सत्ता में रह, बेहतर प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, अब तो लोग सिल्वर, गोल्डन ही नहीं डायमण्ड जुबली पर काम कर रहे है। भाई लोग मानव जीवन को सुगम, सरल, समर्थ बनाने के बजाये, किसी नाटक, फिल्म की पट कथा लिख उसे सुपरहिट बनाने में अपनी उस्तादी मान रहे है। शिक्षा जगत में जहां आई.टी., आई.आई.टी. का दौर, तो राजनीति में एम.बी.ए. का फण्डा फल फूल रहा है। 

अगर ऐसे में कुछ हमारे बीच सस्ता है तो हम भोले भाले भारत वासियों की भावनायें है जिसे किसानों की तरह लागत के बराबर मूल्य तो दूर की कोणी उसकी नैसर्गिक सुविधाओं पर भी अब तो गंभीर संकट आ खड़ा है। क्योंकि भावना आधारित सत्ताओं का दौर जो चल पड़ा है। आज की राजनीति में अब न तो वह मूल्य, सिद्धान्त ही नजर आ रहे, न ही हम अपने जीवन मूल्य, पर परा, संस्कृति की ही रक्षा कर पा रहे। 

ये अलत बात है कि कुछ नेता संगठन अवश्य राष्ट्रीयता को लेकर पीडि़त मानवता की सेवा और गांव, गली, गरीब, किसान के लिये चिन्तित व संघर्षरत है, मगर समस्या बड़ी है। कारण साफ है कि नई-नई तकनीक से लेकर कूट रचित, सामाजिक व्यवहार, आचरण अब सत्ता उन्मुख राजनीति का कारगार हथियार बन चुका है। और अब सारा दारोमदार सत्ता का भावनाओं पर ही आ टिका है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये घातक हो सकता है। 
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