सत्ता लालचियों के आगे कलफता लोकतंत्र

व्ही.एस.भुल्ले। देश में जिस तरह से सरकारे सतत सत्ता में बने रहने स्वयं के वेतन भत्ते सहित अपने अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन भत्ते बढ़ा...

व्ही.एस.भुल्ले। देश में जिस तरह से सरकारे सतत सत्ता में बने रहने स्वयं के वेतन भत्ते सहित अपने अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन भत्ते बढ़ाने में जुट, कल्याणकारी राज्य बनाने की ओर अग्रसर है। वह जनाकांक्षाओं के साथ भद्दा मजाक ही नहीं, आने वाली पीढिय़ों के साथ घोर अन्याय भी है। कारण साफ है कि न तो सत्तासीनों के पास कोई स्थाई अक्स है, न ही कोई नक्शा कि चरण बद्ध विकास कर कैसे लक्ष्य तक पहुंचा जाये। और न ही ऐसी कोई नीति जिससे जनकल्याण सुनिश्चित हो पाये।

           चर्चाओं की माने तो व्यवस्था के नाम चहुं ओर अराजकता, हठधर्मिता, काम चोरी पसरी पड़ी है। न तो कोई शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा, सडक़, परिवहन सहित जल, जंगल, जमीन नीति है, जिसमें स्थाई औद्योगिक विकास तो हाफनी भरता नजर आ रहा है। 
    सडक़ों पर बढ़ते वाहनों की अराजकता ऐसी की सुकुड़ती सडक़ों पर फर्राटे भरती जवानी ने पैदल चलने वालो को हलाक कर, रखा है। डरते सहमते लोग यह नहीं सोच पा रहे कि आने वाली पीढ़ी क्या अब घर के अन्दर से ही वाहनों पर भर्राटे भरती निकलेगी या फिर कुछ दूर पैदल चलने वालो को भी शहरों में सडक़े बचेगीं। 
    देश की दौलत को तेल, पैट्रोल में फूकने वाली देश की जवानी आखिर कहां जाकर रुकेगी यह सवाल आज भी यक्ष बना हुआ है। शुगर से लेकर ब्लड प्रेसर, पथरी, हद्दयघात के बढ़ते मरीजों का आने वाले भविष्य में क्या आंकड़ा रहेगा कहना मुश्किल। मगर सतत सत्ता के बढ़ते नशे के बीच जनाकांक्षायें कहां थमेगी, कोई नहीं कह सकता। मगर इतना तय है अगर ऐसा ही कुछ और वर्षो तक चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब, इस महान लोकतंत्र में कई ऐसे सवाल होगें। जिनका जबाव न तो सत्ता मद में चूर उन लोगों के पास होगा। जो सत्ता के लिये कुछ भी कर गुजरने तैयार है और न ही उन तालियां ठोकने वालो की उस जमात के पास कुछ होगा जो अन्ध भक्त बन, ऐसे सत्ताधारियों में अपना सपना देखते है, जिन्हें सत्ता लालच और स्वयं के स्वार्थ बढक़र कुछ भी नहीं। आखिर कैसे बने मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र  जिसमें मानवता कुलाचे मार खुशहाल जीवन जी सके। 
              जय स्वराज 

पीडि़त मानवता को सबक, शिवपुरी में बढ़ी सत्ता की हनक 
शिवपुरी- देश के अधभुत शहर में चारों खाने चित पड़ी व्यवस्थाओं से पीडि़त मानवता भले ही कलफ रही हो। मगर शहर में बढ़ती सत्ता की हनक से दल भाई ाले ही खुश हो। लेकिन मानवता फिलहाल आंसू बहाने पर मजबूर है। सीधे सत्ता के मुखिया के आव्हन को दरकिनार कर स्वयं की सुन्दरता के अहंकार में डूबे, इस शहर ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि कि कभी उसकी वह सुन्दर तस्वीर एक बदनुमा दाग में बदल सकती है। और भविष्य में उसे कभी ऐसे दिन भी देखने होगें, जो दिन भगवान कभी दुश्मन को भी न दिखाये। 
       कहने को आज इस शहर से जुड़े केन्द्र ही नहीं, राज्य सरकार में शिवपुरी से औपचारिक अनौपचारिक रुप से प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग गाड़ी भरे मंत्री और दलों में बड़े-बड़े ओहदों को सौभाय मान है। इतना ही नहीं शहर के मौजूदा हालात निजात पाने और जनसुविधाओं को बहाल करने जिला न्यायालय से लेकर हाई कोर्ट तक पहुंच लोग न्याय की गुहार लगा रहे है। 
        मगर पीडि़त मानवता को वो सुविधायें भी ठीक से नसीब नहीं, जो नैसर्गिक है। या जिनके पूरे दाम चुकाने के बाद भी उन्हें नसीब नहीं जिसके कि वह हकदार है। कलफती मानवता के बीच आश्वासन पर आश्चासन और कछुआ गति से बर्बाद होते शहर का दुर्र्भाग्य आने वाले समय में यह भी हो सकता है कि राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण से बदहाल होते पुराने पुल, सडक़ों के चलते कहीं अन्य शहरों से जुड़ा स पर्क टूट यह शहर कहीं टापू न बन जाये। क्योंकि जर्जर हो चले पुल और नई सडक़ निर्माण के नाम चल रही नूराकुश्ती तो यहीं कहती है।
      इतना ही नहींं दिन-दूनी रात चौगुनी रफतार से रसातल को जाता भूजलस्तर व जबाव देता मात्र एक जल श्रोत चांदपाठा भी अब देखभाल के आभाव में दम तोडऩे के कगार पर है। खाइयों में तब्दील शहर के मु य सडक़े भले ही न बोलती हो, मगर शाम ढलते ही सडक़ों से उठने वाले धूल के गुबार घरो में सोते लोगों को जगा देते है और पानी की चिन्ता इन्हीं निरीह प्रााणियों को रतजगा करा देती है। क्योंकि कई जगह दो कट्टी पानी के लिये लोगो को रात भर भटकने मजबूर होना पड़ता है। 
         21वी सदी के लोकतंत्र में स्टेट टाइम का सर्वसुविधा युक्त शहर आज जिस तरह बर्बाद बदसक्ल बेहाल पड़ा है वह अपनी  दुर्दशा, बर्बादी देख खून के आंसू रोता होगा। मगर अंधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर शासित यह शहर अब किसी भी भले इन्सान और मानवता के लिये, किसी काले पानी से कम नहीं। कैसी इस शहर में राजनीति है और कैसी जनकल्याणकारी सरकार और जनसेवा की संवेधानिक शपथ लेने वाले वह लोग अगर पीडि़त मानवता और जनचर्चाओं की माने तो अब यह शहर किसी शोधकत्र्ता के लिये किसी शोध केन्द्र से कम नहीं जहां दिया तले अंधेरा होने की कहावत को प्रमाणिक रुप से सिद्ध कर सकता है। 
                      जय स्वराज 
२ ्रह्लह्लड्डष्द्धद्वद्गठ्ठह्लह्य

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सत्ता लालचियों के आगे कलफता लोकतंत्र
सत्ता लालचियों के आगे कलफता लोकतंत्र
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