सत्ता संघर्ष और सर, चढ़, बोलता, अहम, अंहकार

व्ही.एस.भुल्ले। माननीयों आपके सत्ता संघर्ष और चुनावी रणनीति को लेकर ाले ही राजनैतिक पंण्डित और हमारी महान मीडिया खुश हो। मगर हमारे हालात तो आप लोगों के रहते आज भी ऐसे है कि हम गांव, गली, गरीब पर तो इतने वस्त्र और उतना पर्याप्त भोजन भी नहीं, जो हम आपके व्यान, वायदे, इरादों की तरह समय अनुसार उनके हालात बदल सके। हम 83 हजार करोड़ से अधिक सस्तेराशन के मोहताज क्या जाने की 21वी सदी की राजनीति कैसी और कैसे होगी। 

मगर वर्तमान में सत्ता और अहम अहंकार के चलते जो चल रहा है वह बड़ा ही डराबना है। माननीयों सच कहे तो घर में बैठ अगर तेज आवाज भी हम सुन ले, तो सहम जाते है। हमारे परिजन टी.व्ही. पर चलने वाली आपकी बहस और अखबारों में छपने वाले व्यानों को पढक़र डर जाते है। 

माननीय ऐसा नहीं कि हम गांव, गली के लोग कमजोर दिल व दिमाक वाले है मगर क्या करें। हमारी बैवसी संस्कृति, संस्कार हमारे आड़े आते है। हम तो किसी की भी जनसेवा, राष्ट्र सेवा, देश भक्ति को लेकर कोई संदेह नहीं, न ही हमें किसी का प्रमाण पत्र देखनेे की आवश्यकता और अधिकार है। हम निरीह प्राणियों को चिन्ता तो मात्र बस इस बात की है कि जो रस्साकसी सत्ता को लेकर आप लोगों के बीच हमारे महान देश में चुनावों में मचती है, उसके चलते  कहीं ऐसा न हो कि इस सत्ता के खेल में जो वस्त्र, भोजन कड़ेसंघर्ष के बाद हम बदनसीबों को नसीब होता है। कहीं उसमें खलल पड़ उसके भी लाले न पढ़ जाये। 

क्योंकि आप ही के बीच के जो लोग आज अहम अहंकार में डूब, किसी भी कीमत पर चुनाव जीत सत्ता चाहते है, कहीं उनके मंसूबे तार-तार न हो जाये। बैसे भी हमें आपकी निष्ठा ईमानदारी, जनसेवा, राष्ट्रभक्ति पर कतई कोई संदेह नहीं, न ही हमारे आप लोगों को लेकर कोई सवाल। मगर माननीयों आखिर हमारा क्या गुनाह है। जो हम बहादुरशाह जफर से लेकर, नाना साहब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, लाल, बाल, पाल, महात्मा गांधी से लेकर भगत, विस्मिल, आजाद, वीरसावरकर से लेकर पण्डित दीनदयाल, श्यामा प्रसाद, अ बेडकर, लोहिया, जयप्रकाश, जवाहर, शास्त्री, इन्दिरा, राजीव, अटल, सोनिया जैसी विभूतियों के साथ अब तो हम मोदी की भी जय-जय कार बोलने तैयार है। 

मगर पण्डित जी की तस्वीर लगा, गरीबों का राशन व गांधी जी की तस्वीर लगा, मद्यपान को बढ़ाने व लोहिया, अ बेडकर के नाम अपनी-अपनी सत्ता चमकाने वालो की जय बोलने आखिर हम कैसे तैयार हो सकते है।

क्या हम गांव, गली, गरीब का कसूर सिर्फ इतना है कि हम आप लोगो पर अंध विश्वास कर मुफलिसी का जीवन जी, अपने ही लोगों के बीच मौजूद वातावरण में हम बैवस है। क्योंकि हम उस महान भू-भाग के अंश है जहां बड़े-बड़े धर्म गुरु विभूतियों में जन्म ले, हमेशा इन्सानियत का संदेश दिया है। 

फिर उनका रुप-स्वरुप जो भी रहे हो। अब तो माननीयों हम गांव, गली, गरीब का आप लोगों से करवद्ध निवेदन ही नहीं, एक गुजारिश भी है, कि विगत 70 वर्षो में हमारी कई पीढिय़ां इन्हीं आभावों आश्वासनों के बीच आज तक सफर करती आई है। अब तो कुछ ऐसा करों, जिस पर हम ही नहीं स पूर्ण देश गर्व महसूस कर सके। हम गांव, गली के लोग ऐसा नहीं मानते कि आप लोगों के कुनवे ने देश व देश के लोगों की खातिर आज कुछ भी नहीं किया। हमारा मानना है कि आप लोगों में से ही लोगों ने दिन रात एक कर अपना खून पसीना एक कर यहां तक कि आप लोगों के बीच से पीडि़त मानवता की सेवा में समुचा जीवन लगा, देश के लिये अपनी जान की कुर्बानियां तक दी है। सच बोले तो देश में जैसे भी हुआ बहुत कुछ हुआ है। हम आपको विश्वास दिलाते है, जहां-जहां हमारे उन महान नेताओं की देश की खातिर हम गांव, गरीब, गली की खातिर एक-एक खून, पसीने की बूंद गिरी है या जो कुर्बानियां हुई है। 

उसका हमारे दिलों में सस मान पूरा हिसाब-किताब है। और उन्हीं का अनुसरण कर, हम 83 करोड़ के लगभग सस्ते राशन के मोहताज लोग स्वयं को उस भू-भाग के निवासी होने के नाते गौरांवित महसूस कर, गर्व महसूस करते है। और इसी गुरुर और गर्व के साथ खुशहाल जीवन जीने हर रोज संघर्ष करते है। हम उन्हीं महान विभूतियों को साक्षी मान संकल्प दोहराते है कि जिन लोगो ने भी औपचारिक-अनौपचारिक रुप से राष्ट्र व आम गांव, गली, गरीब की ाातिर अपना समुचा जीवन लगा, सर्वस्य न्यौछावर किया है। हमारा महान देश, गांव, गली के लोग ऐसी महान विभूतियों का अनादिकाल तक इस महान भू-भाग पर रिणी रहेगा। काश आप लोग भी सत्ता के लिये होने वाले संघर्ष में हमारी उन महान विभूतियों को साक्षी रख, चुनावों के दौरान मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति हमारी स यता, संस्कृति और संस्कारों के अनुसार करें तथा चुनावों के दौरान या राजनैतिक लाभ की दृष्टि से होने वाली घटिया व्यानबाजी पर लगाम कसे, तो निश्चित ही हम एक स्वस्थ लोकतंत्र के साथ शक्तिशाली, स पन्न खुशहाल राष्ट्र बना पायेगें।  
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