देश में दरिन्दगी का दर्द बेवस प्रतिभाओं पर व्यवस्था का कहर

वीरेन्द्र शर्मा, क्षेत्र जो भी हो, मगर जिस तरह से दरिन्दगी का दर्द दंश भुगत रहा है, उस व्यवस्था में प्रतिभाओंं पर कहर किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने काफी है। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि हम सभी एक महान देश और उस देश में मौजूद महान लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंग है। मगर जिस तरह का कत्लेआम  हमारे ही देश व्यवस्था में सरेआम प्रतिभाओं का हो रहा है, वह भी अहम अहंकार स्वार्थो के चलते वह किसी से छिपा नहीं। 

फिर क्षेत्र जो भी हो चाहे वह समाज, जाति, क्षेत्र हो या फिर सभ्यता, संस्कृति, विधा हर क्षेत्र ऐसा ही कुछ भरा पड़ा है। मगर अफसोस कि एक वक्त था। जब सारा देश आक्रान्ताओंं के खिलाफ एक था। मगर जब आज हमारे अपने ही हमारी व्यवस्था के अंग है। ऐसे में प्रतिभाओं की हत्या ही नहीं सरेयाम कत्लेयाम मचा हो और हम चुप है, यह शर्मनाक है। क्योंकि आक्रान्ता तो चले गये, मगर उनके अंश के रुप में गोल बन्द लोग मौजूद उन प्रतिभाओं के हत्यारों की पूरी फौज मौजूद है। जो लोकतंत्र की मजबूरी का लाभ उठा, व्यवस्था के सरंक्षण में खूब फल-फूल रही है। और अपने अहम अहंकार स्वार्थ में डूब देश की प्रतिभाओं का दमन करने में लगी है। 

समाज राजनीति, धर्म अर्थ से लेकर इन लोगों का बोलबाला हर छोटे से छोटे क्षेत्र में है। जिन्हें हमेशा यह दर्द सताता है कि कहीं ऐसा न हो कि मूर्ख व्यवस्था में उनकी धूर्त प्रवृति का सर्वनाश हो दिव्य प्रतिभायें उनके आवरण को अन्धकार में डाल दे। यह हम महान भारत वासियों का र्दुभाग्य है। देखना होगा कि हमारी आने वाली पीढ़ी इसे किस हिसाब से लेती है। सच तो यह है कि देश महान बनने और पीडि़त मानवता को जीवन को खुशहाल बनाने मेें हमारे अपने ही राष्ट्र की विषय वस्तु के आभाव में सबसे बड़ी बाधा हुये है।
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