कलफती पीडि़त मानवता पर व्यवस्था का कहर, पठानी बसूली से परेशान लोग

मप्र शिवपुरी। अगर देश में केन्द्र राज्य सरकारों सहित नगरीय निकायों को प्राप्त होने वाले आयकर, वाणिज्यकर, सेवा कर एवं नगर विकासकारों को छोड़ भी दें, तो सरकारों द्वारा गठित सेवा प्रदाता क पनियों को मुंह मांगी कीमत चुकाने को बावजूद भी निर्धारित सेवा प्रदाता क पनियां कानूनी संरक्षण में सुलभ सेवा प्रदान करने तैयार नहीं। अब इन क पनियों का यह व्यवहार पीडि़त मानवता के साथ मजाक है या क पनियों का प्रतिशोध और सरकारों का अहंकार जो पीडि़त मानवता पर कहर भी ढा रही है। और कानून की आढ़ में मोटा माल भी उगाह रही है। 

अब इसके पीछे का सच या तो ये कंपनियां ही जाने या फिर वह सरकारें जो पवित्र सदनों में शपथ ले, इन क पनियों को सरंक्षण दे चलाती है। स भवत: यह देश नहीं मध्यप्रदेश का ऐसा जिला मु यालय है। जिसका सच विगत 7 वर्ष से चीख-चीख कर शहर ही नहीं देश के सर्वोच्च सदनों में भी न्याय की गुहार लगा रहा है। 

इस जिले में मौजूद अल्लहड़ अधिकारी न तो अपने आका, न ही माई बापों सहित माननीय न्यायलयों की सुनने तैयार है, क पनियों और निकायों की अराजकता का आलम यह है कि यहां न तो सरकार न आला अफसर, मंत्री, मु यमंत्री और स्वयं जनता को ही सुना जा रहा है। 

           बेजान तकनीक से लेस दिल्ली, पूना, भोपाल से संचालित इन शासकीय क पनियों द्वारा समस्या समाधान का आलम यह है कि स्वयं के द्वारा स्वयं की सरकारें चुने जाने और बेहतर सुविधायें मोटी कीमत चुकाने के बावजूद भी शहर की जनता यूं तो विगत 7 वर्ष ही नहीं, 3 वर्ष से कु भी पाक नरक का नजारा पथराई आंखों से बेवस हो, देखने पर मजबूर है। 

          चाहे मामला एन.एच.ए.आई. भारत संचार निगम लिमिटेड, म.क्षे.वि. वितरण क पनी या फिर नगर पालिका से जुड़ा हो, जिन्हें सेवाओं की मुंह मांगी कीमत कानूनी संरक्षण में मिलने के बावजूद वह सुलभ सेवा, सुविधा देने तैयार नहीं। जहां पहले निर्माण पश्चात टॉल टेक्स के माध्ययम से एन.एच.ए.आई. तो फिक्स प्लान मोबाईल सेवा, इन्टरनेट, लेंडलाइन के नाम हर मार निर्धारित राशि तो वहीं बिजली क पनी मुंह मांगे बिल तथा हर वर्ष स पत्ति विकास कर उगाने वाली नगर पालिका सरकार व कानून के संरक्षण में आम पीडि़त मानवता को खून के आंसू रुला रही है। 

                  मजे की बात तो यह है कि जो लोग इस अराजकता के जि मेदार है। वह अधिकारी कर्मचारी वर्षो से अपने ही पदों पर जमे मोटी तनखाह तो कमा ही रहे है। बल्कि सेवा सुविधा का भी मजाक उड़ा, कानून और सरकारों को अंगूठा दिखा रहे है। मगर उनका कोई बाल बाका नहीं कर पा रहा। 

             बहरहाल जो भी अगर किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारों तथा संवैधानिक संरक्षण प्राप्त माई बापों के रहते निरीह पीडि़त मानवता के साथ सरेयाम अन्याय हो रहा है। तो यह समुची व्यवस्था और स य समाज के साथ भारी अन्याय है। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक को उसे उसके मूल-भूत अधिकारों सुविधाओं से बन्धित करना, न्याय विरुद्ध है और जब सेवा, सुविधा की निर्धारित कीमत चुकाई जा रही हो, फिर भी वह मयस्सर न हो, तो लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई अपराध नहीं है। मगर मेरे शहर में सबकुछ चल रहा है।  
जय स्वराज 
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