निर्दयी सरकार...........? फिर कलफेगें जीव, दम तोड़ेगें पशु-पक्षी

व्ही.एस.भुल्ले, लोकतंत्र में पनपता रिवाज भी निराला है कि पहले सत्ता, फिर सत्ता और सत्ता प्राप्ति के अहंकार में चूर सरकारों को क्या पता कि प्रकृति अपने नौनिहालों को किस तरह भीषण गर्मी के दौरान अपनी पथराई आंखों से बैवस पेयजल के अभाव में तडफ़-तडफ़ कर मरता देखती है और सबकुछ होने के बावजूद भी अपने दर्द पर खून के आंसू रोती है।

गर्मी की शुरुआत और पेयजल उपलब्धता सुगम न होने की सुगबुहाट एक मर्तवा फिर से वहीं पीढ़ा प्रकृति असहनीय पीड़ा झेलने के लिये मजबूर नजर आती है। जिस प्रकृति के सरंक्षण का जिम्मा समाज और सरकारों में निहित होता है। इससे इतर समाज रोजी, रोटी और वैभव बढ़ाने सरकार समुचे प्रदेश की पीढ़ा को विसरा में मां नर्मदे  के नाम यात्रा कर वोट पकाने में जुटी है। 

फिलहाल भीषण गर्मी के मुहाने पर खड़े शेष म.प्र. में इस अहम गुस्ताखी के चलते गांव, गली में हा-हा कार मचना स्वभाविक है। मगर वर्तमान हालातों के मद्देनजर नहीं लगता कि औपचारिक-अनौपचारिक तौर मरने वाले सेकड़ों हजारों जीव-जन्तु, जानवरों के प्रति वह कितनी संवेदनशील और गम्भीर है। आज शासन की अकमण्यता के चलते जीव जगत के साथ जो भारी अन्याय हो रहा है, जिसे मानवीय दृष्टि कोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। और न ही उसे एक जबावदेह व्यवस्था का कर्तव्य 

बहरहाल जो भी हो, अगर समय रहते सरकार प्रकृति संरक्षण के लिये भीषण गर्मी में पेजयल उपलब्ध कराने की दिशा में अभी आगे नहीं बढ़़ी तो कोई कहे न कहें, जीव जगत के आगे जिन्दा रहने का संकट आना स्वभाविक है। हो सकता है जिसकी बड़ी कीमत जीव-जन्तु सहित पशु-पक्षियों को पेयजल के आभाव में चुकाना पड़े।  
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