बड़ी सर्जरी, बम्फर जीत: समय संकल्प का, न कि सियासत का

विलेज टाइम्स। उप्र के चुनाव परिणाम आने के साथ ही किसी को जीत, तो किसी को भले ही हार मिली हो, मगर उत्तरप्रदेश के गांव, गली ने इस चुनाव में संदेश साफ कर दिया है। कि राजनीति में पूरी तैयारी रणकौशल के साथ सत्ता हथियाने विजन स्पष्ट होना चाहिए। परिणाम लगभग बैसे ही साबित हुये जिसकी स भावना विलेज टाइ स ने स्वराज विचार आधारित पूर्व में ही व्यक्त की थी। कि विकास और युवा तरुणाई का साथ उप्र में चमत्कारिक परिणाम देना। क्योंकि उप्र का मिजाज ही कुछ ऐसा है और परिणाम पश्चात लगभग इन मुद्दों से जुड़े दलो का परिणाम भी यहीं रहा। 

यह सही है कि अखिलेश के विजन, विकास को लेकर युवा उत्साहित तो थे। और बहुत कुछ उन्हें इस चुनाव में युवाओं का भरपूर साथ भी मिला। मगर शायद वह स्वच्छ, जनकल्याण, विकास की राजनीति का ककहरा गढ़ते-गढ़ते यह भूल गये कि राजनीति में चाडक्य ने साम, नाम, दण्ड, भेद का उल्लेख यूं ही नहीं किया था। शायद सत्ता हासिल करने वर्तमान राजनीति में इससे उमदा कोई हथियार हो। 

हो सकता है राज्यसभा में स्वयं की कमजोरी की काट निकालने भाजपा ने पहले ही अन्य प्रदेशों को लक्ष्य न कर सारी ताकत उप्र में ही झौंक दी और परिणाम सामने है। नोटबंदी से लेकर 7 चरणों वाले चुनाव क्षेत्रीय दलों में तोड़-फोड़ और बूथ स्तर तक वोट प्रबन्धन इतना जबरदस्त रहा। साथ ही मीडिया प्रबन्ध ने तो मानो आग में घी कीतरह कार्य किया। 

मगर इतनी जबरदस्त रणनीति के आगे आपस में झगड़ते दल और नोटबंदी से कंगाल उन नेताओं ने सपने में भी न सोचा होगा। कि सत्ता हासिल करने इतनी हाइटेक राजनीति भी पार परिक राजनीति को भुला हो सकती है। मगर कहते है अब पश्चात होत क्या जब चिडिय़ा चुग गयी खेत। 

देखा जाये तो 2017 के विधानसभा चुनाव में अगर किसी को बड़ा नुकसान हुआ है तो वह बसपा है भले ही सपा के नये विजन और विकास को सीटे कम मिली हो। मगर उसे दूसरे न बर का स्थान तो अवश्य मिल ही गया। भले ही बसपा, सपा के 25 वर्षो के शासनकाल में बड़े धर्म-जाति के अहंकार ने भाजपा का रास्ता सरल किया हो। मगर कहते हताशा ही दिलाशा भी देकर जाती है। सो सपा को यह चुनाव आने वाले दिनों में कोई नई भूमिका सौंप दे, तो कोई अति संयोक्ति न होगी। मगर इसके लिये जरुरी होगा कि सपा अपने विकास और विश्वास के मुद्दें पर युवाओं को समेट नये लक्ष्य के लिये नई रणनीत के साथ आज से ही शुरुआत करे तो हो सकता है आने वाले समय में उसे उसकी फिलहाल कोई विरासत फिर से मिल जाये। क्योंकि वर्तमान चुनाव परिणामों को लेकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि यह उप्र की सत्ता हासिल करने में नियति का बड़ा योगदान रहा, या फिर नीति का जो भाजपा ने उप्र में अपनाई। 
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