जनाकांक्षा, जीवन्त दलों का होगा 2019- स्वराज फिलहाल अक्षम विपक्ष

विलेज टाइम्स व्ही.एस. भुल्ले: गठबन्धनों के दौर में भारतीय राजनीति का अन्जाम क्या होगा यह तो देश के राजनैतिक दल और नेता ही जाने तथा लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रुप में माल काटने वाली तथाकथित मीडिया ही जाने, मगर एक बात अवश्य तय है कि वर्ष 2019 देश की जनाकांक्षा और जीवन्त दलों का होगा। जो गांव, गली की महात्वकांक्षाओं पर खरा उतरेगा।

भले ही भारतीय लोकतंत्र में स्व. इन्दिरा जी के बाद देश का मोदी सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हो। मगर दोनों ही स्थिति में बड़ा अन्तर यह है कि स्व. इन्दिरा जी के समय व्यक्ति, संगठन एक ही था। मगर मोदी के रुप में मोदी और संगठन का लक्ष्य और स्वभाव अलग-अलग है। जहां संगठन की प्राथमिकता अभी दूर की कोणी नजर आती है वहीं मोदी का लक्ष्य फिलहाल 2019 है। 

मगर यहां यक्ष सवाल यह है कि विपक्षी दलों का भविष्य और भूमिका भारतीय लोकतंत्र में वर्तमान हालातों के मद्देनजर क्या होगी। जो अपनी मंशा अनुसार या तो गठबन्धन या फिर राष्ट्रीय राजनीति को निर्जीव मानकर भाड़े की एजेन्सियों के सहारे पूर्ण कर संगठनों को प्रायवेट लिमिटेडों की तरह चलाना चाहते है। जबकि विपक्षी दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान सत्ताधारी दल केवल एक मात्र संगठन नहीं, वह कई घोषित-अघोषित और नवगठित होते जा रहे छोटे-मोटे बड़े वैचारिक सहयोगियों का संगठन है। जिसके कई प्रकल्प भारतीय राजनीति में मौजूद है व कई प्रकल्पों के गठन का कार्य अभी भी युद्ध स्तर पर जारी है। 

ऐसे में अपना वैचारिक संगठनात्मक आधार खो चुके दलों का महागठबन्धन कितना कुछ 2019 में कर पायेगा, फिलहाल कहना मुश्किल मगर इतना तो तय है। कि बगैर संघर्ष और जीवन्त संपर्क तथा वैचारिक मुद्दों के बगैर बहुत कुछ होने वाला नहीं। क्योंकि भारत की नई पीढ़ी जनाकांक्षा पूर्ति, जीवन्त संपर्क के साथ अब परिणाम चाहती है। कारण साफ है कि जो भी दल जनाकांक्षा और जीवन्त संपर्क के रास्ते को दुरुस्त कर पायेगेंं, हो सकता है, सन 2019 उन्हीं का हो। मगर विपक्षी दलों के हालात देखते हुये नहीं लगता कि सन 2019 में संघर्ष बराबर का हो पायेगा। 
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