राष्ट्र निर्माण में भक्ती की भूमिका अहम, महान भारत को 2-5-10 नहीं 1 वर्ष ही बहुत है। बन जायेगा खुशहाल भारत- मुख्य संयोजक स्वराज

देश में तीन दशक पहले सत्ता का केन्द्रीकरण और व्यवस्था में बिखराव का जो प्रादुर्भाव हुआ उसने स्थापित मूल्य, सिद्धान्त, परंपरा, संस्कृति को ही तार-तार नहीं किया, बल्कि मुल्क को एक ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया, जहां अब पीडि़त मानवता के कल्याण के लिये नये-नये प्रयोगों की शुरुआत स्वभाविक है। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि मानों देश में सच कहने और सच सुनने की परंपरा खत्म होने के साथ हमारी पहचान ही खत्म हो गयी। 

जो लोग देश को खुशहाल संपन्न सशक्त बनाने 10-20 वर्षो की बात करते है शायद उन्हें पता नहीं कि महान भारत भू-भाग किस मिट्टी का बना है। जिस देश के महान नागरिकों ने नंगे-भूखे रह, बड़े-बड़े बलशालीयों व प्राकृतिक आपदाओं को समय-समय पर परास्त किया हो। क्या उस महान मुल्क के महान नागरिक उस महान भू-भाग को मात्र एक वर्ष में खुशहाल नहीं बना सकते, जिसे वह मातृ-भूमि या एहले वतन कहते है। 

कारण साफ है कि सत्ता आधारित व्यवस्था में आज समाज, सरकारों के मोहताज और सत्ता अंहकारी हो, तो उस मुल्क में पूरी सदी भी खुशहाल बनाने की गरज से, संघर्ष करते हुये क्यों न गुजार दी जाये।तब भी वह राष्ट्र्र कभी भी खुशहाल नहीं बन सकता। 

आज देश की अकूत संपदा और गांव गरीब का र्दुभाग्य यह है। कि खजूर से टूटे पेड़ पर लटके वाली स्थिति आ गयी है। कहने का तात्पर्य यह है कि देश में अनुकूल वातावरण पाने लिमिटेड प्रायवेट लिमिटेडों से छूटे और कॉरपोरेट जगत में आ उलझे। 

ऐसा नहीं कि देश में पीडि़त मानवता गांव, गली के लिये पहली मर्तवा क्रान्तिकारी योजनायें बनी हो, इससे पूर्व भी बनती बिगड़ती रही। मगर न तो तब, और न ही अब इन योजनाओं का ठीक से क्रियान्वयन हो पा रहा है। परिणाम कि पहाड़ से 3 वर्ष गुजरने के बावजूद भी प्रति हितग्राही लाभ प्राप्ति को आंकड़ा अवश्य पड़ा हो। मगर स्थिति अनुसार जीवन सरल सुरक्षित खुशहाल नहीं हो सका और न ही पीडि़त मानवता  गांव, गली का जीवन स्वयं संचालित होने की स्थिति में पहुंच सका। 

अगर हम चाहते तो उन 65 वर्षो के उस विकास या विनाश को भूल भी जाये जिसे देश के गांव, गली, पीडि़त मानवता भोग रही है। तो इन तीन वर्षो का खाका भी यहीं कहता है कि राहत भरी योजनाओं के माध्ययम से वोट बढ़ाने का कार्य भले ही तीव्र गति से बढ़ा हो। मगर कोई ऐसा सिस्टम स्थाई रुप से डवलप नहीं हुआ। जिस पर चल हम खुशहाल भारत की कल्पना कर, लक्ष्य पाने की ओर बढ़ सके। 

भारत की राजनीति में छत्तीसगढ़, म.प्र. एक ऐसे उदाहरण है, जहां विगत 13-13 वर्षो से एक ही दल की सरकारें चल रही है। मगर सच तो यह है कि इन प्रदेशों में बचपन, जवानी ही नहीं पीडि़त मानवता भी कलप रही है मगर जो विश्वास भारत के केन्द्रीय नेतृत्व पर गांव, गली व पीडि़त मानवता ने जताया है। नोटबंदी के स त निर्णय पश्वात ऐसे माहौल में वर्ष-2022 का लक्ष्य हासिल करने 5 वर्षो का इन्तजार नहीं किया जा सकता, देश में कभी यह नारा भी कॉफी बुलन्द हुआ कि जिन्दा कॉमे कभी इन्तजार नहीं करती। 

देखा जाये तो महान देश में कभी आयडिया योजना प्रतिभा संसाधनों की कमी नहीं रही, अगर कोई कमी तो उस क्रियान्वयन की है, जो हमेशा से गांव, गली, गरीब व पीडि़त मानवता के विकास में एक बड़ी बाधा रहा और इस बाधा पर जीत स्वराज से ही स भव है। 

मगर र्दुभाग्य कि हम खण्डित जीवंत आकांक्षाओं में उलझे हुये है। जो प्राकृतिक सिद्धान्तों के विरुद्ध है। स्वराज एक बार पुन: यह साबित करने के प्रयास में संघर्षरत मात्र एक विचार है। कि जीवंत जनाकांक्षायें ही खुशहाल राष्ट्र का निर्माण कर सकती है क्योंकि तकनीक सहायक हो सकती है, मगर मार्गदर्शक कदापि नहीं। 

चूंकि देश बड़ा है जनाकांक्षायें भी अनेक है जब तक सत्ता के केन्द्र देश, समाज, संस्थाओं, संगठनों में छिपी उन विलक्षण प्रतिभाओं के लिये, हरे कॉरपेट पर चलने वालो को छोड़, गांव, गली व पीडि़त मानवता के लिये सत्ता के केन्द्र तक पहुंचने लाल कॉरपेट नहीं बिछाती तब तक, इस देश में लक्ष्य भी निर्धारित होगें और योजनायें भी बनेगी। मगर परिणाम सिर्फ सिपर ही रहने वाला है।

जरुरी नहीं अच्छे शासक महलों में और अच्छे जनसेवक, राष्ट्र व जनसेवा, भावी संगठनों में पैदा हो। वह विलक्षण प्रतिभायें महान देश के गांव, गली पीडि़त मानवता के बीच भी जनसेवा, राष्ट्र सेवा के लिये संघर्ष करती है। जो अनादिकाल से बड़े-बड़े परिवर्तनों की हामी रही है। जरुरत है उन्हें ढूढ संरक्षण देने की, न कि जात, धर्म, संस्था, संगठन, दलों को देख, उन्हें संरक्षण दें, उन्हें सत्ता या संसाधन जुटाने की। मगर इस महान राष्ट्र के गांव गरीब का यहीं र्दुभाग्य है कि जिन संस्थानों में चितंक, विचारक, प्रतिभायें होना चाहिए और जिन्हें सत्ता के केन्द्रों के संपर्क में होना चाहिए जिससे राष्ट्र निर्माण हो सके। मगर उन जगहों पर आज सत्ताधारी दलों के वोट कमाऊ नेता, गुन्डे, नेताओं के नाते-रिस्तेदार, चैले-छर्रे, सत्ता सौपानों में गुलछर्रे उड़ाते नजर आते है। जब तक यह तिलिस्म नहीं टूटता, तब तक स्वराज लोगोंं के जहन में गूंजता रहेगा और खुशहाल भारत का सपना अधूरा रहेगा।  
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