सिकुड़ती सडक़े बढ़ता सैलाब, देश में जन, धन का दैत्य बना वाहन व्यापार

विलेज टाइम्स/भोपाल। अब इसे हम अपना सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि हमारे महान देश ही नहीं देश के शहरों में बढ़ता वाहनों का सैलाब और सुकुड़ती सडक़ों का परिणाम यह है। कि जन, धन, हानि के साथ दैत्य बने वाहन व्यापार को आज देश झेलने पर मजबूर है। 

मगर सडक़ों पर वाहन के रुप में दौड़ते मौत के ताबूतों की दरिन्दगी रोकने न तो हमारे पास कोई डिजाइन, डिटेल, डी.पी.आर. है, न ही कोई ऐसा पैमाना जो, अरबों, खरबों रुपया गाढ़े पसीने की कमाई लुटाने के बावजूद हमें सुखद सराहनीय परिणाम दें सकेे। और वाहनों में यात्रा करने वालों को सुखद सुरक्षित यात्रा का माध्ययम बन सके। बल्कि हमें हमारी इस भूल का जो परिणाम भुगतना पड़ रहा है। वह किसी भी स य समाज के लिये बड़ा ही हास्यपद लगता है। बढ़ती बेरोजगारी की खुजली मिटाने, बढ़ती वाहन इडस्ट्रीज के माध्ययम से भी जन, धन का नुकसान तो हो ही रहा है। वहीं दूसरी ओर  पैट्रोल, डीजल के माध्ययम से भी राष्ट्रीय धन का नुकसान हो रहा है।

इतना ही नहीं, बढ़ते वाहनो के प्रचलन के चलते बीमार लोगों का जो बाजार तैयार हो रहा है। जिसमें भी देश का जन और धन दोनो स्वाहा हो रहे है। मगर फिक्र शायद ही किसी को हो, मगर दर्द इस देश का यह है कि राष्ट्रवादी, राष्ट्र भक्त तो अनेक है। मगर सडक़ पर सरेयाम मरती जनता का कोई शुभचिन्तक नहीं। अगर कुछ लोग है, चाहे वह सत्ता में हो या फिर विपक्ष में कुछ करना चाहते है। मगर देश में बड़ी सोच और बड़े दिल वालो का बड़ा ही आभाव है। क्योंकि आज हमारे महान देश के महान दल प्रायवेट ही नही, लिमिटेड क पनियों में तब्दील हो, सत्ता के माध्ययम से सौहरत का बड़ा मुनाफा कमाने, बहुराष्ट्रीय क पनियों में तब्दील हो चुके है, तो यह कहना कोई अतिसंयोक्ति न होगी।  
जय स्वराज 
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