अहम, अहंकार में जनधन का कबाड़ा: व्यवस्था के नाम गांव, गली में पसरी अराजकता

व्ही.एस.भुल्ले। सरकारों के अहम अहंकार और नौकरशाही की अल्लहड़ता के चलते विकास के नाम जो जनधन का कबाड़ा हुआ है। वह गांव, गली में पसरी अराजकता के रुप में स्पष्ट देखा जा सकता है। सडक़ निर्माण से लेकर भवन निर्माण हो या फिर पेयजल से लेकर बिजली जिसमें बढ़ते अतिक्रमणों ने तो मानो सारे रिकार्ड ही धरासायी कर डाले। 

      अगर अपुष्ट सूत्रों की माने तो शासकीय राजस्व, वन भूमि ही नहीं, तालाबों के कैचमेन्ट ऐरिया सहित सडक़ों पर इस कदर दबंगों द्वारा अतिक्रमण किया है। कि तालाब अब गड्डों में तो सडक़े गलियों में तब्दील हो चुकी है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 

          इतना ही नहीं शासकीय भूमियों पर आवासीय अतिक्रमण मानों तो एक बड़ा व्यवसाय बन चुका है। जिसके चलते आज पटवारी, तेहसीलदार किसी साहूकार, जमीदार से कम नजर नहीं आते। तो इनके संरक्षण में भू-माफियाओं का चमकता कारोबार किसी रियल स्टेट कारोबारी से कम नहीं है। राजस्व की अलहड़ता का परिणाम है कि जनधन या शासकीय धन से निर्मित कई भवन करोड़ों अरबों फूकने के बावजूद उपयोगी नहीं। ऐसा ही कुछ पेयजल, सिंचाई को लेकर करोड़ों, अरबों फूकने के बाद इस बात की गारन्टी नहीं कि लोगों को समय से शुद्ध पेयजल नसीब हो पायेगा। अब तो गर्मी ही नहीं सर्दियों में भी पेयजल को लेकर मारामारी है। 

       वहीं सजा के कानून से लेकर मनमानी बसूली में माहिर बिजली क पनियों से कोई पूछने वाला नहीं कि बिजली चोरी आखिर हजारों करोड़ फूकने के बाद क्यों नहीं रुक रही, क्यों आज भी अतिरिक्त बिजली उत्पादन के बावजूद किसान को पूरी बिजली नहीं मिल रही। 

      बढ़ती अराजकता इस बात का परिणाम है कि सरकारें अपने अहम अहंकार और नौकरशाही अल्लहड़ बन पूर्णत: अर्कमण्यता में डूबी है। जिसमें गांव, नगर विकास के लिये जबावदेह संस्थायें या तो राजनैतिक या फिर विकास सेवा के नाम लूटपाट के अड्डों में तब्दील हो चली है। 

      ऐसे में सच क्या है यह तो सरकारें और नौकरशाह ही जाने, मगर सच यह है कि गांव, गली में पसरी अराजकता आज भी इन्सानियत के लिये चींख रही है।
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