गांव, गली की रोटी ला सकती है स्वराज

विलेज टाइम्स। ज्ञात हो कि खुशहाल भारत की खातिर पहला संघर्ष 1857 में रोटी के ही सहारे हुआ था जिसेे पूर्ण होने में हजारों देश भक्तों की कुर्बानी पश्वात 90 वर्ष का समय लगा और अनादिकाल से हमारी यहीं संस्कृति हमें स पन्न, खुशहाल महान और संस्कारवान बनाने में कामयाब रही।

आज जब हम अपने ही महान देश में आजाद रह, अपने ही मत के माध्ययम से अपनी ही जनकल्याणकारी सरकारें चुनते है व अपने व अपनो सहित आने वाली पीढ़ी के सुनहरे भविष्य के लिये संघर्ष करते है। तो हमें एक सुख की अनुमति होती है। मगर आज जब अपने ही हाथों अपने द्वारा चुनी गई सरकारों की कार्य प्रणाली और व्यवहार देखते है और उससे जो अनुभूति हमें होती है तो उसे दे ा हम स्वयं को ठगा महसूस करतेे है। जिसके चलते होने वाले चुनावों में उसकी जगह हम एक नई सरकार चुन लेते है। मगर कई मर्तवा इस तरह से सरकार चुनने के बावजूद भी हमें मेहसूस होता है। कि जिस वर्तमान, भविष्य के सुनहरे सपनों को लेकर हमने मत किया था। वह तो जहां के तहां है ऐसे में वर्तमान हालातों के मद्देनजर गांव, गली की चिन्ता स्वभाविक है। कारण हमारी संस्कृति, संस्कार, स पूर्ण शिक्षा के आभाव में दम तोड़ते संस्कार है। 

ऐसे में हमारी रोटी संस्कृति आज भी यथावत जिन्दा है। जिसके संरक्षण की आज देश को स त जरुरत है। जिसमें व्यक्ति, परिवार, समाज, मीडिया की अहम भूमिका है। मगर नैतिक रुप से फिलहाल सभी हासिये पर है। क्योंकि बगैर गांव, गरीब के तब भी कुछ नहीं हुआ और न आज भी कुछ नहीं होने वाला है। जरुरत आज रोटी संस्कृति के संरक्षण की है। क्योंकि गांव, गली, गरीब और रोटी, संस्कृति ही हमेंं शसक्त, स पन्न, खुशहाल भारत की पहचान दिला सकती है। जो बगैर स्वराज के अस भव है। और यह तभी स भव है। जब हम सेवा, सुरक्षा और संरक्षण के मार्ग को पूरी निष्ठा, ईमानदारी से क्रिन्यानवित करें अर्थात रोटी, संस्कृति की तरह कर्म करें। 

जिस तरह रोटी मनुष्य के जीवन को आगे बढ़ती है उसी तरह स्वराज भी खुशहाल जीवन की बाधायें हटाता है। क्योंकि यह मानव स्वभाव है। जो जल, थल, नभ, चर सहित वनों में देखने मिलता है। बेहतर हो, हम प्राकृतिक सिद्धान्तों का पालन कर मानव जीवन सहित प्रकृति प्रदत्त अपनी जबावदेहियें को पूरा कर अपना कत्र्तव्य निभायें। तभी हम उस महान भू-भाग के सच्चे और अच्छे रहवासी कहला पायेगें। जिसकी याति समुचे विश्व में रही है। क्योंकि इस महान भू-भाग पर कई आयें कई गये। लोग आज भी सिर्फ उन्हीं को याद रखते है जिन्होंने महान भारत की मानवीयता को कायम रखने का कार्य किया। और अपने कत्र्तव्यों का बगैर किसी भेदभाव और स्वार्थ के निवर्हन किया। 
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