बेईमान मीडिया को लेकर बढ़ते सवाल: खोते, स्वाभिमान, सम्मान के आगे कड़े संघर्ष का संकट

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। बेईमान मीडियों को लेकर चल रहे, ट्रायल पर सवाल अब किसी गांव, गली से नहीं, बल्कि यह अहम सवाल बेईमान मीडिया को ...

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। बेईमान मीडियों को लेकर चल रहे, ट्रायल पर सवाल अब किसी गांव, गली से नहीं, बल्कि यह अहम सवाल बेईमान मीडिया को लेकर विश्व के कोतवाल कहें जाने वाले अमेरिका की धरती से, विश्व के सबसे ताकतवर व्यक्ति के माध्यम से चर्चाओं में आया है। ऐसा सवाल विश्व की महाशक्ति के मुखिया ने ऐसा नहीं कि यह सवाल पहली मर्तवा किया हो, ऐसा उन्होंने दूसरी मर्तवा दोहराया है अब इसके पीछे का सच तो वहीं जाने या फिर महान भारत की भूमि के भू-भाग रायबरेली से भी मीडिया को लेकर सवाल आया है।  बैसे तो इससे पूर्व भी भारतीय समाज में प्रीत पत्रकारता या अघोषित रुप से पैकेज माफिया को लेकर चुनावों के दौरान दबी कुचली जुबान में मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के हित को लेकर कई मंचों से चर्चा रही है। तो  कभी-कभी संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों द्वारा मीडिया की भूमिका को लेकर उनकी पीढ़ा रही है। 

देखा जाये तो आज मीडिया के आचरण व्यवहार को लेकर जिस तरह से सार्वजनिक मंचों या फिर सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, क्षेत्रों में दबी कुचली जुबान में तेज चर्चा चल रही है। वह लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों के लिये अहम ही नहीं, विचलित कर देने वाली है। जिसका मूल कारण सत्ताधारी लोगों के लोकतंत्र में निहित स्वार्थ और समाज का अन्जाने में ही सही मीडिया से अनौपचारिक असहयोग आत्मक व्यवहार हो सकता है।  

इस सबके बावजूद ाी लगता है कि मीडिया के मुखियाओं ने अभी तक ऐसा कोई सबक नहीं लिया, जिसके बल पर यह कहा जा सके। कि मीडिया पर सवाल खड़े करना ही बेइमानी है।

देखा जाये तो किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी के स्वरुप में मौजूद मीडिया आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद भी कुछ वर्षो तक समाज और देश को दिशा देने एक मिशन के रुप में रही। मगर जब से मीडिया पूंजीपति घराने या सत्ताधारी दलों की सोची समझी रणनीति का शिकार हो, अपने मूल्य स्वरुप से भटकने लगी। तभी से सवाल खड़े होना शुरु होने लगे। अगर यो कहे खासकर भारतीय मीडिया में 25-30 वर्षो के अन्तराल में उसका स्वरुप ही बदल बदरंग दिख रहा है, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। क्योकि वर्तमान में मौजूद मीडिया को संसाधन या तो स्वार्थी सत्ताधारियों से या पूंजी पतियों से ही उपलब्ध हो पा रहे हो। और संवैधानिक संस्थाओं तथा समाज का योगदान संसाधन जुटाने में नंगण्य हो,  तो ऐसे में मीडिया का दुरुपयोग अपने कत्र्तव्यों से भटक होना स्वभाविक है। 

सबसे बड़ी बिडंबना भारतीय लोकतंत्र में यह भी है, कि हमारी सरकारें जागरुक करना तो दूर अभी तक विृतानिया हुकुमत द्वारा स्थापित शिक्षा की विषय वस्तु एवं शिक्षा के लिये प्रशिक्षित शिक्षकों की फौज से ही मुक्ती दिला सही शिक्षा ही नहीं दे पायी। न ही ऐसी कोई पारदर्शी नीति मीडिया को लकर बना पाई, जिससे वह अपने पवित्र स्वरुप और स्वच्छन्द वातावरण में पोषित हो पाती है। और न ही अब मीडिया हाउसों में मालिक एवं स पादकीय क्षेत्र में ऐसा कोई अन्तर बचा जिस पर यह उ मीद की जा सके। कि एक पवित्र पत्रकारिता पूंजीपतियों और सत्ता लालचियों के दो पाठों में पिस जिन्दा रह पाये। जिसका लाभ उठा सरकारें पूंजीपति, पवित्र मीडिया की आड़ में अपने मंसूबे पूरे करने में लगेे है और बेचारी मीडिया बदनाम होती जा रही है। 

अगर गुलाम भारत में मीडिया मातृ-भूमि के लिये एक मिशन था। तो आजादी के बाद स्वच्छन्द मीडिया को प्रोत्साहन करना और बेईमान मीडिया पर अंकुश लगाना सरकारों और समाज का काम था। जिसे न तो समझदार सरकारों ने किया और न ही रोटी, कपड़ा, मकान के संघर्ष में डूबे आधे से अधिक समाज अपनी वैवसी मजबूरी के चलते कर सका। अब इसे लोकतंत्र का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि जिस समाज में आज भी 4 पेज से लेकर 12-16 पेज के मल्टीकलर अखबार दो-ढाई रुपये में बिकते हो और बिन्डल, सिगरेट 10 रुपये तथा शराब हजारों मेें गली-गली गांव-गांव बिचते हो तो मीडिया की दुर्दशा का अन्दाजा हमारे महान लोकतंत्र में लगाया जा सकता है। 

सच तो यह है कि जहां सरकारें पूंजीपति अपनी-अपनी सुविधा अनुसार छोटे-बड़े प्रलोभनों के साथ मीडिया का दुरुपयोग कर, देश को समर्पित मीडिया को तरह-तरह से अघोषित रुप से कुचलते रहे है। और मीडिया हाउसों से गलबहियों कर, मीडिया हाउस और कई नेता, दल देश का धन व सत्ता सुख, मन माफिक ढंग से लूटतेे रहे है। ऐसे में मीडिया की र्दुगति स्वभाविक है।  

मगर अब वर्तमान हालातों में अधिकांश मीडिया हाउसों को, न तो पत्रकार, न ही पत्रकारिता की जरुरत है। और न ही दलगत रुप में बटी सरकारों को सच पढऩे-सुनने की आदत है। ऐसे में कुछ अखबार प्रचार के पे पलेट, तो कुछ मल्टीकलर से सुसज्जित सजावट के पोस्टर बन, स्वयं स्वार्थ पूर्ति के माध्ययम बन गये है। अगर यो कहे कि सुविधा अनुसार सूचना स प्रेषण के माध्ययम या माल बनाऊ  उघोगों के केन्द्र बन गये है, तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये खतरनाक ही नहीं किसी भी स य समाज के लिये शर्मनाक भी है। 

आज जिन अखबारों में बलात्कार, मर्डर, एक्सीडेन्ट एवं भ्रष्ट नेताओं से जुड़े समाचार एवं समाज को लूटने वाले लोगों के फोटो अखबार की हेडलाइन बने और समाज व देश को दिशा देने वाले समाचार खबर न बने, तो ऐसी मीडिया से राष्ट्र व समाज को कोई उ मीद भी नहीं की जानी चाहिए। 

            शायद विश्व की महाशक्ति के सबसे ताकतवर व्यक्ति ने बेईमान मीडिया पर सवाल खड़ा कर, वहीं किया जो आज कोई राजनेता नहीं कर पाया। रायबरेली से भी वहीं सवाल हुआ जिसे देश में आज तक कोई नहीं कर पाया। अब समय आ गया जब भारत की महान मीडिया जगत से जुड़े लोगों को अपनी महान पहचान, मान-स मान, बचाने के लिये एक होना होगा और संगठित हो कोई ऐसा रास्ता निकालना होगा जो भगवान नारद द्वारा सतयुग में स्थापित स यता, संस्कृति को जिन्दा रख मीडिया के मान-स मान और स्वाभिमान को बचा सके। 

    देखा जाये तो आज मीडिया को मान-स मान एवं स्वाभिमान बचाने जरुरी नहीं कि बड़े-बड़े आलीशान ऑफिस 24 घन्टे चलने वाले चैनल और मल्टीकलर अखबार ही हो, बैसे भी अनादिकाल से अपने धर्म का पालन करती आ रही है और आज भी मीडिया के पास संगठित हो, ऐसे कई माध्ययम संसाधन मौजूद है जिनके सहारे मीडिया के उस स्वरुप को फिर से खड़ा किया जा सकता है। जिसके लिये मीडिया को जाना पहचाना जाता है और स्वार्थी लालची राजनेता, दल, पूंजीपतियों को सबक सिखाया जा सकता है जो मीडिया को बेईमान और बिकाऊ समझ मीडिया के नाम अपना उल्लू सीधा कर देश की महान जनता को अपने स्वार्थो के चलते उसे भ्रमित कर उसके साथ विश्वासघात करने में लगेे है।  

   और यह तभी स भव है जब हम एक हो, अपने हुनर का पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ समाज और राष्ट्र के लिये मौजूद संसाधनों के बीच अपने कार्यो के माध्ययम से बेईमान और पवित्र मीडिया में अन्तर कर सके। जिससे एक बार फिर से हमारे महान लोकतंत्र में ईमानदार स्वाभिमानी, स मानित मीडिया को अपने पैरो पर खड़ा किया जा सके। फैसला भगवान नारद के वंशज कहे जाने वाले उन महान मीडिया कर्मियों को लेना है, जो स्वयं के जमीर को, निर-अपराध होने के बावजूद भी कलंकित होने की तोहमत उठाने पर मजबूर है। क्योंकि सही गलत पर सवाल होना लाजमी है और वक्त का तकाजा भी तभी हम एक स य समाज और व्यवस्था कहला पायेगें। 
जय स्वराज

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बेईमान मीडिया को लेकर बढ़ते सवाल: खोते, स्वाभिमान, सम्मान के आगे कड़े संघर्ष का संकट
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