सेवा के नाम गांव, गली से मजाक खतरनाक

विलेज टाइम्स। जितनी महान, भोली, भाली, हमारे देश की जनता है उसका फक्कड़ स्वरुप उसकी शान है, और  उसका गुरुर भी, मगर ऐसी महान आवाम से अपने निहित स्वार्थो के चलते मजाक किसी भी स य समाज के लिये बड़ा ही खतरनाक है। कहते है किसी भी जीव का परम हंस स्वभाव ईश्वर के अंश के सामान होता है। ऐसी जनता की जनाकांक्षाओं की अवेहलना जनसेवकों के बीच किसी महा पाप से कम नहीं। मगर हमारे महान लोकतंत्र में ऐसा ही कुछ घट रहा है। जिसे देख के आम बुद्धिजीवी, जागरुक नागरिकों का विचलित होना स्वभाविक है। 

      हमारा देश गांव, गली से बना है और लोकतंत्र हमारी शान है, जो जनता द्वारा जनता के लिये चुनी गई सरकार में स्वराज का सपना देखता है। मगर निहित व्यक्तिगत या सामूहिक स्वार्थो के चलते जब जनाकांक्षायें, जनभावनायें, मायूस, मजबूर नजर आने लगे, समझों लोकतंत्र खतरे में है। 
          मगर लगभग आज ऐसा ही कुछ हमारे देश में चल रहा है जब भी सत्ता परिवर्तन या नई सरकार चुने जाने का समय देश की महान जनता के सामने आता है। सुनियोजित रुप से निहित स्वार्थो में लिप्त व्यक्ति, संगठनों द्वारा एक ऐसा माहौल बना दिया जाता है। कि जनभावना, जनाकांक्षायें भ्रमित होने पर बैैवस और मजबूर हो जाती है। और जन सेवा का दम भरने वाली सरकारें सत्ता में आते ही अहम अहंकार में डूब जनहित के नाम स्वहित में जुट जाती है। तब गांव, गली की महान जनता स्वयं को ठगा सा महसूस कर मायूस हो जाती। यह क्रम आजादी के बाद से अनवरत जारी है। ऐसा नहीं कि देश में जनसेवा, राष्ट्र सेवा का कार्य नहीं हुआ, यह काम भी हमारे राजनेता, नौकरशाहों द्वारा पूरी निष्ठा ईमानदारी से किया गया। मगर विगत वर्षो में देश की राजनीति व व्यवस्था में प्रबल हुये कुछ स्वार्थी तत्वों ने सतत सत्ता में बने रहने के लिये जिस तरह की नीतियां अपना रखी है उन्हें देख आज समुचा देश ही नहीं गांव, गली सहित हमारा लोकतंत्र भी शर्मसार नजर आता है। 
     अगर सत्ता की खातिर ऐसा ही कुछ निहित स्वार्थो के लिये और कुछ वर्षो तक चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम आम गरीब की बददुओं का शिकार हो, हमारे स्वस्थ लोकतंत्र के लिये तरस जाये। बेहतर हो कि हम लोकतांत्रिक व्यवस्था अनुसार ऐसे राजनीति का सूत्र पात करे जिससे गांव, गली ही नहीं आम व्यक्ति के मन में भी जनतंत्र, लोकतंत्र का भाव पूरी गुरुर के साथ नजर आये। 
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