तकनीक के तिलिस्म में दम तोड़ती जनभावना, कंपनियों में तब्दील, दलों का सशुल्क घमासान

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। सतत सत्ता या सत्ता हासिल करने की होड़ में जिस तरह हमारे अपने ही दल जनकांक्षा कार्यकत्र्ताओं को दरकिनार कर नई-नई तकनीक, ऐजेन्सी, क पनियों के माध्ययम से भावनाओं के सहारे अपना-अपना उल्लू सीधा करने में जुटे है। उसे देखकर तो यहीं कहा जा सकता है कि सत्ता हथियाने या सत्ता में बने रहने के मामले में हमारे दलो ने अब तो अंग्रेजों को भी मात कर दिया है। छवि चमकाऊ क पनियों पर अरबों, करोड़ों फूक सत्ता हासिल करने वाले दल आम गांव, गली, गरीब की क्या भला, और सत्ता में आने के बाद कैसी-कौन सी सेवा करेंगे, यह यक्ष प्रश्र आज भी देश के सामने है। 

       आखिर आभाव और गरीबी में जिन्दा रह, समस्याओं में उलझे रहने वाला आम नागरिक सत्ता के लिये मचे इस कोहराम को क्या समझे और उसकी कौन सी तथा कैसी सेवा की जा रही है। सच तो यह है कि वह आज भी गांव, गली में बैठ अपनी पथराई आंखों से अपने सेवकों को जहाज, हेलिकॉप्टर ही नहीं महंगे-महंगे लग्झरी वाहनों में फरर्राटे भर  मिनरल वॉटर के साथ हजारों रुपये के कलफदार कपड़ों में घूमते देख रहा है। 

         वह तो यह भी देख रहा है कि सेवा के नाम उसके गाड़े पसीने की कमाई और बैंकों सेकर्ज लें, उसके सेवक दोनों हाथों से कैसे लुटा रहे है। 

  वह यह भी देख रहा है, कि अपने गांव, गली की उधड़ी सडक़े, पानी के लिये रतजगा करती या किलो मीटरों दूर से पीने का पानी लाने वाली माता-बहिने किस तरह हमारे सेवकों के रहते कष्ट भुगतने पर बैवस है। पेयजल के आभाव मरने वाले अपने पशुधन के हड्डियों के ढेर को भी वह देख रहा है। अच्छे खाद, बीज या मौसम की मार से चौपट होने वाली उसकी फसल और बच्चों की आंखों में खुशहाल जीवन की उस उ मीद को टूटते भी देख रहा है। जो सपना हर बच्चा, युवा अपने बेहतर भविष्य के लिये देखता है। 

      वह यह भी देख रहा है कि आन्तरिक सुरक्षा के नाम या उसके अभाव में अपने सेवकों के रहते कैसे लुटता पिटता है। कैसे सरेराह माता-बहिनों के गले से आभूषण लूट के लिये जाते है। कैसे बच्चियों की आवरुओं को दरिन्दे शिकार बनाते है। 

      वह यह भी देख रहा है कि कैसे दवा, चिकित्सकों के आभाव या खत्म हो चुकी मानवता  के चलते उसके अपने उसके सामने ही दम तोड़ जाते है। देश की सुरक्षित परिवहन नीति के आभाव में न जाने कितने असमय ही सडक़ दुर्घटनाओं में मर जाते है। 

       वह यह भी अपनी पथराई आंखों से बैवस हो, देख रहे है। कि उनके गाढ़े पसीने की कमाई खर्च कर, मुंह मांगी फीस देने के बावजूद भी बच्चों के भविष्य को लेकर शिक्षा  माफियाओं के आगे लुटने, पिटने, गिड़गिड़ाने पर मजबूर है। वह अपनी जिन्दगी ार की कमाई और जवानी लुटाने के बाद भी वह अपने बच्चों को कलेक्टर, एसपी, सी.ई.ओ क पनी मालिक विधायक, मंत्री, मु यमंत्री, प्रधानमंत्री पूरे स्वा िामान स मान के साथ नहीं बना पाते है। वह यह भी पथराई आंखों से देखते है कि उनके अपने साथी मजदूर, आधी उम्र बीमारियों से ग्रस्त मर, तो किसान खेत में ही फांसी के फन्दे पर क्यों झूल जाते है। 
        मगर सत्ता के लिये संगठित और अब तो कॉरपोरेट क पनियों की तरह विज्ञापन, छवि चमकाऊ  क पनियों के सहारे सत्ता हासिल करने में जुटे इन दलों का, न तो अब कार्यकत्र्ताओं की आकांक्षा, न ही गांव गरीब की जनाकांक्षाओं की इन्हें सत्ता को छोड़ कोई परवाह है। जनधन के मद में चूर इन दलों को अब सिर्फ सेवा का माध्ययम सत्ता ही बची है। 
      मगर र्दु ााग्य देश के करोड़ों करोड़ गांव, गरीब का जो आज भी कहीं धर्म, तो कहीं जाति, तो कहीं क्षेत्रीय भावनाओं में उलझ मजबूरन अपने मत का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते है। 
    क्योंकि हमारे महान दलों ने सत्ता और गरीब के बीच इतनी गहरी खाई और स्वछन्द सोच समझ तथा सियासत में ऐसी लकीर खींच रखी है। जिसमें लोकतांत्रिक मूल्य सिद्धान्तों का दमन सुनिश्चित है। मगर देश की जनता महान ही नहीं जागरुक और समझदार है। जिसने समय-समय पर बड़े-बड़े धुर सियासी दल और सियासतदारों को बगैर समय गवाये खासा सबक सिखाया है, इसीलिये हमारा देश महान है। बेहतर हो कि देश के दल सत्ता का स्वार्थ छोड़ स्थापित मूल्य, सिद्धान्त अनुरुप राजनीति करें, बरना समझने इतिहास काफी है।

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