बच्चे अंक और सरकारें विश्व बैंक के पीछे न भागें: मुख्य संयोजक स्वराज

विलेज टाइम्स। जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने बच्चों को अंक के पीछे न भागते हुये ज्ञान बढ़ाने की बात, मन की बात में कही है। उससे उत्साहित स्वर...

विलेज टाइम्स। जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने बच्चों को अंक के पीछे न भागते हुये ज्ञान बढ़ाने की बात, मन की बात में कही है। उससे उत्साहित स्वराज विचार के मु य संयोजक वीरेन्द्र भुल्ले जी ने कहा है कि यह सही है कि बच्चों को अंक के पीछे न भाग और ज्ञान बढ़ाये। मगर सरकारों को भी यह समझना होगा कि वह भी विश्व बैंक या शिक्षा के लिये यूरोपियन देशों से मिलने वाले धन के पीछे न भागे। 

     क्योंकि जिस तरह अंको की चाहत नैसर्गिक, प्राकृतिक ज्ञान में बाधक है। उसी प्रकार विश्व बैंक से मिलने वाले कर्ज या यूरोपियन देशों से मिलने वाले धन की चाहत खुशहाल भारत निर्माण में बाधक है। 

           बैसे भी स य समाज में कर्ज कभी उचित नहीं माना जाता। खासकर भारतीय ाू-भाग पर तो बिल्कुल भी नही,  ऐसे में कर्ज देने का पैमाना शर्तो के पालन के साथ हो, तो कैसे स्वच्छन्द माहौल में अपने आध्यात्म, पर परा, संस्कृति अनुसार प्राकृतिक सिद्धान्त के अनुरुप खुशहाल भारत का निर्माण किया जा सकता है। 

       नजीरे गवाह है कि जिस तरह से गांव, गली का सूतखोर आम गरीब को नहीं पनपने देता, उसी प्रकार विश्व का सबसे बड़ा रिणदाता बैंक जिसका व्यापार ही रिण कमा, अपने बड़े शेयर होल्डरों को आर्थिक ही नहीं नीतिगत लाभ पहुंचाना है। अगर यो कहे कि देश ही नहीं कई प्रदेशों में बढ़ते भ्रष्टाचार, व्यवस्थागत अराजकता के पीछे उन रिणदाता संस्थाओं की ही वह ऊल-जुलूल शर्ते है। जिसके चलते हमारी संवैधानिक संस्थाओं में व्यवस्था चारों खाने चित नजर आती है, जिसमें सुधार का आज भी कोई ओर छोर नजर नहीं आता। 

        अगर इस यक्ष प्रश्र का जबाव देश के माननीय प्रधानमंत्री जी अपने सबसे लोकप्रिय, प्रसारित कार्यक्रम, मन की बात में जिस तरह से बच्चे अंक के बजाये ज्ञान बढ़ाये। कहते है तो पहला सवाल यहीं है देश में बच्चे ही नहीं युवाओं को ज्ञान बढ़ाने मौजूदा भारतीय शिक्षा में वह विषय वस्तु कहां है, जहां से ज्ञान जन्म लेता है। वह पारिवारिक, सामाजिक प्ले स्कूल, नर्सरी, प्राथमिक माध्यमिक, हाईस्कूल, विश्व विद्यालय कहां है, जहां से प्रतिभायें स्वच्छन्द माहौल में अपना मार्ग विद्ववान, प्रशिक्षित, शिक्षा को समर्पित गुरुजन के सहारे किया करते थे। जहां से विवेकानन्द, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जैसे विद्ववान पैदा हुये। ऐसे विश्वविद्यालय कहां गये, जहां राष्ट्र ाावना से ओत-प्रोत मां जननी की खातिर दुश्मनों से बगैर सेना के छात्र और अध्यापक, आचार्य उलझ जाते थे। 

            वह छात्र नेता कहां गये, जहां बड़ी से बड़ी सरकारों के त ता पलट हो जाते थे म.प्र. में डी.पी. मिश्रा और देश में सन 1977 की केन्द्र सरकार उदाहरण है। आखिर आजादी के 70 वर्ष बाद क्या आप, अगली मन की बात में देश के गांव, गली, गरीब को बतायेंगे कि 67 वर्ष तक अपने ही देश आजाद भारत में अपनो के रहते शिक्षा नीति में बदलाव क्यों नहीं हो सका, और इन 3 वर्षो में भी देश के भविष्यों के लिये कोई शिक्षा नीति क्यों नहीं बन सकी। जिससे देश गर्व कर पाता। माननीय इतना नहीं, तो इतना तो बताया ही जा सकता है, कि हमारी सरकारों की ऐसी क्या मजबूरी है, जो वह हमारी शिक्षा नीति नहीं बना पा रही। 

    इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आपका देश के प्रति समर्पण और निर्णय लेने की क्षमता लाजबाव है। फिर परिणाम जो भी रहे। आज कैश-लैश के माध्ययम से जो नई शिक्षा, तकनीक से देश का गांव, गली, गरीब निढाल होकर भी आपके नेतृत्व में दो-दो हाथ करने तैयारी है। शायद आपने भी कल्पना न की होगी, कि इसके क्या परिणाम भविष्य में जनहित व देश हित में मिलने वाले है। जो परिणाम स्वच्छता अभियान, जनधन बीमा, मुद्रा बैंकों के माध्ययम से आ सकते है। अगर इसके परिणाम लाने के सार्थक प्रयास हुये तो विश्व विरादरी में भारत की यह वो ल बी छलांग होगी, जो अकल्पनिय मगर विश्वनीय होगी। मगर ऐसे में जरुरत है आपकी तरह समर्पित देश को समर्पित लोगों की जिन्हें खोजना भी आप ही की जबावदेही है।   

       जब वर्ष, महिने, दिन घन्टे नहीं, मिनटों में लाखों के वेतन भत्ते हमारे महान सदनों में मेजे थपथपा कर पास हो जाते है और अहम, अंहकार के चलते सदन के समुचे सत्र स्वाहा हो जाते है तो आज तक हमारी वैभवशाली शिक्षा नीति क्यों नहीं बन सकती? क्यों हमारी प्रतिभायें आज या तो अंको के पीछे भागने मजबूर है या फिर ईश्वर प्रदत्त विधा से विमुख हो दूर होने बैवस है। 

      अगर प्रधानमंत्री जी इन सवालो का हल खोजने में आप देश भक्तों के माध्ययम से सफल रहे, तो देश की आने वाली पीढ़ी आज की तरह ही आपको, आपकी सरकारों को सर-आंखों पर बैठायेगी और भारतीय इतिहास में यह लाइन अवश्य स्वर्ण अक्षरों में लिखी जायेगी। बरना 70 वर्षो का इतिहास गवाह है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे महान  भारतीय अध्यात्म ने हमेशा मानव जगत की खुशहाली के लिये कुछ न कुछ अवश्य दिया है, और वह क्रम आज भी निरन्तर जारी है।  जरुरत आज हमें हमारे अन्दर के सच की पहचान कर, स्वराज के रास्ते आगे बढऩे की है, जिससे हम हमारी पीढ़ी ही नहीं, अपने राष्ट्र को खुशहाल मार्ग पर आगे ले जा सके। 
जय स्वराज 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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