बदलाव को तैयार, देश का दर्द, बजट-2017: डिजाइन, डिटेल, न ही डीपीआर, कैसे हो, अब नैया पार

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। भले ही बेहद सावधानी एवं ग्रामीण विकास की मंशा के साथ बदलते भारत का सर्वोच्च सदन में कुछ बदलावों के साथ बजट 2...

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स। भले ही बेहद सावधानी एवं ग्रामीण विकास की मंशा के साथ बदलते भारत का सर्वोच्च सदन में कुछ बदलावों के साथ बजट 2017-18 प्रस्तुत हो गया हो, और गांव, गली के मूड़धन्य, कथाकथित अर्थ शास्त्र में दखल रखने वालो का बहुमूल्य मत बजट को लेकर आ चुका हो। मगर गांव, गली, गरीब, किसान के मत को छोड़, बदलते देश और हमारे लोकतंत्र में गांव, गली, गरीब भले ही सत्ता तक पहुंचने के रास्ते से बाहर हो चुका हो। लेकिन सरकारी सोच और आंकड़ों में उलझी, सरकारों के रहते, कैसे स भव होगा। स पन्न, खुशहाल भारत का सपना यह प्रश्र आज भी देश के गांव, गली, गरीब, राष्ट्रभक्त, बुद्धिजीवियों के सामने है। जो यह सवाल करते नहीं थकता, कि डिजाइन डिटेल, न ही डी.पी.आर, कैसे हो नैया पार। 

देखा जाये तो देश के लगभग 83 हजार करोड़ सस्ते राशन के मोहताज गांव, गली के गरीब लोगों को कोई यह बताने तैयार नहीं, कि हकीकत में बजट क्या होता है, उसके क्या मायने होते है? अब इसे हम अपना र्दुभाग्य कहे या सौभाग्य कि जो हमारी स यता, संस्कृति, संस्कारों के खून में जो बजटीय प्रणाली आज भी मौजूद है। जो तकनीक अनादिकाल से हमारे रोम-रोम में बसी है। जिसके सहारे हमारी माता-बहिने, बहु-बेटी अपना-अपना घर परिवार चलाती आ रही है। वह कार्य आज न तो हमारी सरकारें, न ही नई-नई तकनीकों से लेश हमारे नौकरशाह भी कर पा रहे है। 

हमारे महान देश की माता-बहिने, बहु-बेटियां जानती है कि परिवार के कुल आय के हिसाब से परिवार की मंशा, मांग अनुरुप प्राथमिकतायें, सार्वजनिक, राष्ट्रीय, परिवारिक, व्यक्तिगत कैसे पूरी करनी है। कैसे परिवार के लोगों को प्राप्त आय से शिक्षा, रोजगार, सुविधायें दें, सामाजिक, राष्ट्रीय जबावदेही निभानी है। 

वकायदा उनके दिमाग में डिजाइन, डिटेल, डी.पी.आर होती है उसका क्रियान्वयन कैसे हो, वह करके भी दिखाती आ रही है। जो पूर्णत: पारदर्शी और प्रभावी भी व परिवार के अन्दर स्वीकार्य और प्रचारित भी होती है। जिससे देश का गांव, गली, गरीब भी परिचित होता है। 

मगर हम विगत 70 वर्षो में प्रस्तुत होने वाले बजटों को भूल भी जाये, तो 2017-18 के बजट में कुछ बदलाव तो कुछ नई शुरुआत अवश्य है। मगर बदलते देश का दर्द यह है कि आज भी हमारा बजट सरकारी सोच और आंकड़ों से मुक्त नहीं हो सका। जिस तरह से टेक्स, निवेश, सेवा, सुविधा, धन उपयोग व्यवस्था, शिक्षा, सुरक्षा, विकास, रोजगार गली को छोड़, गांव के विकास का पैरोकार नजर आ रहा है। जिसके आंकड़े तो है मगर परिणामों का कोई ओर छोर, न तो आंकड़ों, न ही सरकारी सोच में नजर आ रहा है, जो बड़ा ही निराशाजनक रहा। 

देखा जाये तो सेवा, सुविधा, सुरक्षा सहित शिक्षा, ग्राम विकास के क्षेत्र में आंकड़ों का पैमाना बढ़ा है। मगर नैसर्गिक सुविधाओं का रख रखाव कैसे हो, जल, जंगल, जमीन, जिससे भारत के गांव, गली, गरीब का जीवन ही नहीं अस्तित्व जुड़ा है, इसका उल्लेख नहीं हुआ है। 

जबकि जीवन के लिये जल और जंगल के  लिये सुरक्षा और जमीन के लिये व्यवस्था जरुरी है। जिस तरह रोटी, कपड़ा, मकान का अर्थ रोजगार की पैरवी करता है। उसी तरह जल, जंगल, जमीन, जीवन, उत्पादन और जीने के लिये साधनों का इशारा करता है। काश हमारी सरकारें हमारी स यता, संस्कृति, संस्कारों के सहारे मानव व राष्ट्र कल्याण के गूड़ रहस्य को समझ पाये, तो कोई कारण नहीं, जो भारत एक स पन्न, खुशहाल देश न बन जाये। 
जय स्वराज ..............? 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: बदलाव को तैयार, देश का दर्द, बजट-2017: डिजाइन, डिटेल, न ही डीपीआर, कैसे हो, अब नैया पार
बदलाव को तैयार, देश का दर्द, बजट-2017: डिजाइन, डिटेल, न ही डीपीआर, कैसे हो, अब नैया पार
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