देश डन्डे से नहीं, पारदर्शी नीति, त्याग भाईचारे से चलते है

व्ही.एस.भुल्ले। तीव्र परिवर्तन के दौर में जो हालात मेरे महान भारत के चल रहे है वह कभी विचलित करने वाले तो हो सकते है, मगर न उ मीदी जगाने वालेे वाले कतई नहीं। हजारों वर्ष का इतिहास गबाह है हमारी महान संस्कृति ने रावण, कंष से लेकर प्रभु राम, कृष्ण सहित। इस महान भू-भाग पर जन्मी कई महान हस्ती, विभूतियों, सूरवीरो, असुरो को देखा है। मगर हमारी महान संस्कृति के आगे कोई भी नहीं टिक सका। और जिस भी समय जो दे ाा, सुना, महसूस किया गया, आज वही सामने शेष है और वह क्रम आज भी जारी है। 

      कोई कितनी ही तरक्की क्यों न कर लें। विज्ञान कितने ही कीर्तिमान क्यों न स्थापित कर ले। मगर लगभग सभी का अस्तित्व हमारे महान अध्यात्म संस्कृति पर टिका है। सो प्रकृति के सिद्धान्त से अनभिज्ञ लोग जो भी मुगालता पालना चाहे, पाल सकते है। इससे पूर्व भी बड़े-बड़े सूर, वीर सम्राट भी इसी तरह के मुगालते पालते रहे है। फिर यह ता मानवों   द्वारा न्याय प्रिय खुशहाल जीवन के लिये एक लोकतांत्रिक व्यवस्था भर है जिसे अभी 70 वर्ष ही हुये है। इन 70 वर्षो में भी बड़े-बड़े अहम, अहंकारी, सूरवीरो के मुगालता फा ता हुये है। क्योंकि सत्ता में बैठते ही लोग भूल जाते है। कि भारत वर्ष वह भू-भाग है जहां प्रकृति पुत्र जन्म ले अपने आचार, व्यवहार कर्मो के आधार पर प्राकृतिक सिद्धान्तों का पालन कर, अपना व अपनी मातृ भूमि का नाम रोशन करते रहे है। 

     क्योकि हमारी संस्कृति बताती है कि कैसे हमें मर्यादित, न्याय प्रिय बगैर किसी भेदभाव, भाईचारे के एक दूसरों की मदद कर, उस अदृश्य शक्ति की सौंपी कायानात को संरक्षित कर, यहां रहने वाले जीव-जन्तु प्राणियों का जीवन कर्म कर खुशहाल बनाया जा सकता है। मगर कुछ अपनी अक्षमता को छिपा, स्वार्थ सिद्धि में जुटे लोगों का मानना है कि शायद वह इतने बड़े, इतने सक्षम है, जो हजारों वर्षो में कोई नहीं कर सका, वह 5-10 वर्षो में कर डालेगें। जो पारदर्शी सर्व कल्याणकारी, प्राकृतिक सिद्धान्त आधारित नीतियों और उनके सटीक क्रियान्वयन के बिना स भव नहीं।   

       ऐसा नहीं कि दरिद्र नारायण की सेवा के उत्थान के लिये अभी तक, देश में ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ महापुरुषों, प्रकृति पुत्रों ने अवश्य अपनी त्याग-तपस्या के बल पर स्वयं को कुर्बान कर बगैर अपने बचपन, जबानी, बुढ़ापे की परवाह किये, बहुत कुछ किया है। जरुरत पड़ी तो अपने कत्र्तव्य निर्वहन देश व दरिद्रनारायण की रक्षा व सेवा के लिये कुर्बानियों तक दी है। और आज भी देने तैयार और दे रहे है। क्योंकि हमारी मातृ ाूमि हमारी संस्कृति महान है, जो हमें इस प्रकार कर्म करने के लिये उत्साहित करती है।  

          मगर र्दुभाग्य कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम समाज व प्रकृति के दुश्मनों ने एक मर्तवा फिर से प्रकृति व समाज का वातावरण, पर्यावरण प्रदूषित कर अपनी धमक बना रखी है। जो हमारी सियासत, शिक्षा, सत्ता, सेवा को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है। 

       परिणाम कि आज कुछ जगह विकास, विश्वास के नाम जनधन का उलीचा और लूट मची है। सच बोलने से रोकने बेईमान, स्वार्थियों की ल बी फौज खड़ी है। उदाहरण कई हो सकते है मगर सत्ता सु ा हासिल कर सेवा करने के दबाव ने आज हमारी संस्कृति में नया आयाम जोडऩे का असफल प्रयास हो रहा है। जनधन पर छवि चमकाऊ और सत्ता हथियाऊ कुछ लोग, जनधन की लूट में अब तो दरिद्र नारायण की सहानुभूति प्राप्त करने नीतियों के माध्ययम से उन्हें भागीदार बना, सतत सत्ता में बने रहने का रिकार्ड बना रहे है। तो कुछ जो दिल से कत्र्तव्य अनुसार नीव का पत्थर खुशी-खुशी बन अपने महान राष्ट्र की खातिर सब कुछ दांव पर लगा रहे है, तो कुछ हमारी पवित्र संस्कृति को प्रदूषित कर उसे प्रभावित कर, एक बड़ी बाधा बनते जा रहे है। 

      जो हमारे महान राष्ट्र के लिये खतरनाक है, असल चुनौती आज राष्ट्र के सामने यहीं है। क्योंकि जब भी देश में कुछ अच्छा होता है, उसका प्रबल विरोध बगैर सोचे-समझे या जानबूझकर स्वयं का कत्र्तव्य निर्वहन न कर शुरु हो जाता है, जो देश का वातावरण प्रदूषित ही नहीं करता, बल्कि हमारी आने वाली नस्ल को भी प्रभावित करता है। 

     अब इसे हम सौभाग्य कहे या कि अपना र्दुभाग्य कि केन्द्र की सरकार ने कुछ अहम महत्वपूर्ण विषयों को छोड़, देश के जीवन से जुड़े सबसे अहम मुद्दे पर एक सकारात्मक शुरुआत की है। जरुरी नहीं, वह स पूर्ण, सर्वमान्य, सर्व कल्याणकारी हो, हो सकता है। उसमें कुछ खामियां हो उसके लिये हमारी लेाकतंात्रिक व्यवस्था में हमारी संस्कृति अनुसार व्यवस्था है। सकारात्मक सहयोग, सवाल व सलाह देने, अगर सियासत बस यह भी संभव न हो तो सकारात्मक असहयोग और विरोध की है। जिसे सडक़ से लेकर सदन तक किया जा सकता है। मगर वैचारिक, व्यवहारिक, बोली, भाषा, बॉडी लेंग्यूज में हिंसा कतई नहीं होनी चाहिए, यहीं हमारी पुरातन, नैर्सिक संस्कृति है। 

            जहां तक प्रकृति एवं संस्कृति की रक्षा के लिये हिंसात्मक युद्धों का सवाल है तो वह भी हमारी महान संस्कृति का हिस्सा है। जिसका उपयोग हमेशा से ही सीमाओं को लेकर नहीं, प्रकृति हमारी संस्कृति, इन्सानियत, मानवता की रक्षा के लिये होता रहा है। जिसका परिणाम हमारे महान भू-भाग पर मौजूद प्रकृति और संस्कृति से जुड़े, लोगों की मौजूदगी के रुप में सामने है। 

  बेहतर हो कि देश की सरकारें पक्ष-विपक्ष, बुद्धिजीवी खासकर चौथा स्त भ यह बात समझने और सीखने की कोशिस करें, हमारी संस्कृति और हमारा प्राकृतिक सिद्धान्त क्या है। बरना हमारा महान राष्ट्र और संस्कृति तो अनादिकाल से आज तक जिन्दा बनी रही है और रहेगी। और दरिद्रनारायण भी रहे है और रहेगें। मगर गलत मुगालता पालने वालो के वंशजों का आज इस महान भू-भाग पर नामों निशान तक नहीं, इतिहास गवाह है। 
जय स्वराज 
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