चौपट विरासत, सुधार के संकेत: कयासों के बीच कॉग्रेस में नई क्रान्ति का सूत्रपात

व्ही.एस.भुल्ले। चौपट विरासत की अघोषित कमान स हाल राहुल ने अब कॉग्रेस में जो नई क्रान्ति का सूत्रपात किया है या करना चाहिए वह बड़ा ही काबिले गौर है। जिस तरह का परिवर्तन नये वर्ष की छुट्टियों के पश्चात राहुल ने अपनी भाषा और बॉडी लेंग्यूज में किया है। बैसा ही कुछ परिवर्तन वह अब दबे पांव संगठनात्मक स्तर पर भी करते नजर आ रहे है। 

ये अलग बात है कि विगत 30 वर्षो में कॉग्रेस आलाकमान की मजबूरियों के चलते बन्धन, गठबन्धन, चापलूसी के मकडज़ाल में फस संगठन विहीन हो, परिवारिक नेतृत्व या क्षेत्रीय दल तथा जनाधार विहीन सलाहकारों सहित छोटे-मोटे क्षेत्रीय दलो पर निर्भर हो गयी हो। मगर संगठनात्मक उजड़ी विरासत को सबारने राहुल भले ही विगत एक दशक से कड़ी मेहनत कर हैरान-परेशान हो, साथ ही विपक्षी दल सहित मीडिया के बीच उपहास के पात्र रहे हो। मगर वर्ष 2017 से उन्होंने हर स्तर पर सुधार की जो ताबड़-तोड़ शुरुआत की है वह काबिले गौर है। 

उ.प्र. की हजारों कि.मी. की यात्रा कर, राहुल ने उ.प्र. में मजबूत जमीन तरासने की शुरुआत तभी कर दी थी। मगर अब उन्हें जरुरत थी राजनैतिक तौर पर कांटे से कांटा निकलने की सो उन्होंने जनभावना व आम कॉग्रेस कार्यकत्र्ताओं की अकांक्षा विरुद्ध उ.प्र. के चुनाव के दौरान मजबूरन एक बार फिर से बन्धन गठबन्धन की अनुमति दे दी। क्योंकि वह जानते है कि उ.प्र. में विगत 25 वर्षो में संगठन की जो स्थिति बनी है वह किसी से छिपी नहीं और वर्तमान स्थिति तक कॉग्रेस पहुंचने के क्या अहम कारण रहे। कल मु य रुप से जो कॉग्रेस का वोट बैंक था आज वह कितने भागों में वि ाााजित है। और अभी भी कॉग्रेस के अन्दर, उ.प्र. ही नहीं म.प्र. में कॉग्रेस को कमजोर करने वाली कितनी ताकतें मौजूद है। क्योंकि उ.प्र. की हालिया हालातों में राहुल के पास सिवाय बन्धन-गठबन्धन के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं, जो उ.प्र. में कॉग्रेस को जिन्दा रखने जरुरी है। मगर संगठनात्मक सुधार के साथ कॉग्रेस मजबूती के लिये  उ.प्र. के लोग एवंकार्यकत्र्ताओं  के बीच वो संदेश देना जिससे उनका मनोबल ऊंचा बना रहे, यह चुनौती उनके सामने रहने वाली है। 

जहां तक म.प्र. का सवाल है तो जिस तरह की खबरे आजकल आ रही है कि म.प्र. के सभी क्षेत्रीय नेताओं की सूची तैयार कर, उन्हीं के क्षेत्रों में उन्हें फ्री हेन्ड दिया जा रहा है। जिससे निस्तानाबूत हुई कॉग्रेस को पुन: खड़ा कर मजबूत किया जा सके। और जो दिल्ली में स्वयं को म.प्र. का बड़ा क्षत्रप समझते है उनका आकलन किया जा सके। 

शायद यहीं बेहतर रास्ता म.प्र. के हालातों को लेकर हो सकता है, म.प्र. में कॉग्रेस को पुन: खड़ा करने का, मगर इस नाजुक फारमूले पर पुन: पुराने कॉग्रेसी या कॉग्रेस के शुभचिन्तकों को नहीं जोड़ा गया। साथ ही जो लोग राहुल से सीधे जुड़ संगठन में कॉग्रेस को मजबूत बनाने फुल टाइम कार्य करना चाहते है। ऐसे लोगों से राहुल से सीधे स पर्क का रास्ता साफ नहीं हुआ तो सारे प्रयास 2018 में निरर्थक साबित हो सकते है। क्योंकि यह चर्चा भी काफी गर्म है कि राहुल से सीध स पर्क नमुमकिन ही नहीं अस भव है। जब उनके ऑफिस का फोन, ई-मेल ही रेसपोन्स नहीं करता तो स पर्क तो दूर की कोणी है। अगर राहुल इतनी जबरदस्त काकस के बीच रह, अगर सुधार का सपना देखते है या देख रहे है, तो उन्हें हर हाल में सीधे न सही अपने स्टाफ या सहयोगियों के माध्ययम से लोगो से सीधे जीवन्त स पर्क बना होगा। और स भव हो, तो कम से कम उनके कार्यालय के फोन रिसीव या ई-मेल को तो रंेस्पोस करने लायक होना चाहिए जैसा कि आम लोगों में शिकायत है। 

बहरहाल जो भी हो, राहुल ने नये निजाम की शुरुआत तो बेहतर ढंग से की है। मगर उन्हें अपने सिद्धान्तों पर भी अडिग रहना होगा। फिर कितना ही बड़ा नफा-नुकसान राजनैतिक तौर पर क्यों न उठाना पड़ेे। क्योंकि जब वह 10 साल तक कॉग्रेस नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री या प्रधानमंत्री जैस पदो को अनदेखा कर, अपना राजनैतिक भविष्य की नींव अपने संघर्ष के आधार पर तैयार करने जुटे हुये। ऐसे में उ.प्र. जैसे छोटे-मोटे राजनैतिक नफानुकसान के मौके आते-जाते रहेगें, क्योंकि भारत में आज भी गुणवत्ता पूर्ण मूल्य सिद्धान्तों की सियासत बहुमूल्य है। जिसे कभी भी आम भारतीय की आत्मा से दूर नहीं किया जा सकता। फिर वह कितने ही कष्ट और आभावों में क्यों न रहे हो, यह सत्य है। 
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